श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 12, 13, 14 एवम 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 12 , 13, 14 एव 15

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌॥ ।।12।।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥ ।।13।।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌॥ ।।14।।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌॥ ।।15।।



सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान।
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि) प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
   मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (विचार द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय, विपर्यय आदि दोषों को हटाने का नाम 'अपोहन' है) होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (सर्व वेदों का तात्पर्य परमेश्वर को जानने का है, इसलिए सब वेदों द्वारा 'जानने के योग्य' एक परमेश्वर ही है) हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ

आत्मसाक्षात्कार का मार्ग जानने के उपरांत उस मार्ग पर चलने वाले पथिक को ईश्वर की अनुभूति समस्त जगत में व्याप्त होती है। उस व्यक्ति को संसार की हर विभूति में ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव होता है। सूर्य के प्रकाश और तेज, चन्द्रमा की शीतलता और तेज , पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित समस्त प्राणियों, जीवों और वनस्पतियों में उसे एक समान ईश्वरीय अनुभूति होती है। जीवन की सार्थकता को अपने स्व में पहचानने और पाने वाले को हर चर और अचर में एक ही ईश्वर के उपस्थिति का ज्ञान होता है। संसार की हर जानी और अन्जानी  विभूति ईश्वर के कारण है और उन्हीं की उपस्थिति को बताती और अनुभव कराती है।
       प्राणियों के श्वास में भी ईश्वर का ही वास है और उसकी क्रियायँ जिससे उसे जीवित रहने की ऊर्जा मिलती है यानी पाचन वह भी ईश्वर ही है। ईश्वर ही प्राणी की स्मृति, उसका ज्ञान और बुद्धि विवेक भी है और वही एकमात्र जानने योग्य ज्ञान भी।
      इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राणियों से दूरस्थ स्थित सूर्य चन्द्रमा से लेकर  पृथ्वी पर उसके समीप की अग्नि और उससे भी समीप उसका अपना श्वास से लेलर उसकी दैहिक और मानसिक सभी क्रियाओं और उसके समस्त ज्ञान ईश्वर की ही देन हैं। इस प्रकार हम समझते हैं कि ईश्वर और कँही नहीं बल्कि हमारे ही अंदर है और उसे समझने पाने का मार्ग भी हम ही हैं और लक्ष्य भी हम ही हैं। अपने प्रत्येक क्षमता और अपने से बाहर के प्रत्येक विभूति के लिए ईश्वर का कृतज्ञ होकर हम अपने स्व यानी अपनी आत्मा को पहचान पा सकते हैं और समझ सकते हैं कि हम वह नहीं हैं जो हमारी दुनियादारी है बल्कि हम वो हैं जिसे ईश्वर ने अपने अंश के रूप में गढ़ा है और इसलिए हमारा परम् कर्तव्य है कि हम अपने उस स्वरूप को प्राप्त करें जो ईश्वरीय है और जिसे पाना ही ईश्वर के साथ एकाकार होना है।
    व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है कि वह स्वयं को जान समझ पाए। सामान्य तौर पर व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन बुद्धि और विवेक से बना एक पिंड समझता है लेकिन इससे वह तय नहीं कर पाता है कि वह अपनी पूर्णता को कैसे प्राप्त कर सके। श्रीमद्भागवद्गीता के भिन्न भिन्न अध्यायाओं में भिन्न भिन्न तरीके से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। सबका मूल तत्व एक ही है कि व्यक्ति अपने स्व के स्तर पर समान है और उस सूक्ष्म स्तर पर वह ईश्वरत्व से पूर्ण है। किंतु इस सत्य तक पहुँचने का मार्ग उसे सूझता नहीं है तो हर बार अलग अलग तरीके से उसे वैराग्य यानी मोह, माया, संगत आदि से ऊपर उठकर आत्मसमर्पण से ईश्वर की शरण में जाने का ही पाठ पढ़ाया गया है। प्रश्न उठता है कि इस मार्ग से पहुंचेगे कैसे। सो व्यक्ति ईश्वर को अपने से भिन्न किसी सत्ता को समझता है। उसे लगता है कि ईश्वर उससे बाहर कँही और रहता है। इसी हेतु उसे स्वयं से बहुत दूर सूर्य , चन्द्रमा से लेकर पहाड़, नदी आदि सभी बाहरी तत्वों में ईश्वर की उपस्थिति का ज्ञान दिया गया है। किंतु जैसे जैसे व्यक्ति स्वयं के समीप आता है उसे ज्ञात होता है कि ईश्वर तो उसके भीतर ही है बस जरूरत है उन विभूतियों को जिनको वह बाहर खोज रहा होता है उन्हें स्वयं के अंदर खोजने की। जब उन विभूतियों को जो सत्य, अहिंसा, प्रेम, समर्पण, दया , क्षमा , प्रकाश, शीतलता , तेज, ताप आदि को इंगित करते हैं उनको अपने अंदर पाते जाता है उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति होते जाती है। जब तक वह बाहर के भरोसे रहता है तब तक उसके लिए ईश्वर दूर की सत्ता होती है लेकिन जब वह स्वयं के अंदर के भरोसे होता है तब उसे स्वयं में ईश्वरीय प्रकाश की , ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति प्रकट होने लगती है।

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