श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 9
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 9
असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ ।।9।।
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना।
13.आसक्ति का अभाव
जब व्यक्ति किसी से बहुत जुड़ जाता है तो उसकी वजह से मोह और मोह जनित अन्य भाव जैसे लोभ, ईक्षा, ईर्ष्या, आदि का जन्म अवश्यम्भावी हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने जुड़ाव के बन्धन के कारण कुछ भी सही देख पाने में असमर्थ हो जाता है। वैसे जुड़े व्यक्ति या वस्तु के विलगाव से उसे दुख और क्रोध, निराशा और लोभ होते हैं जिसके कारण उसका चित्त चंचल हो उठता है । सगे सम्बन्धियों , मित्रों आदि के प्रति प्रेम होना बुरी बात नहीं होती है, बुरा तब होता है जब यह प्रेम बन्धनकारी हो जाता है और व्यक्ति उस प्रेम में दायित्वबोध से शून्य होने लगता है जिसके कारण से वह हिंसा, असत्य, लोभ आदि का भी वरण करने से नहीं हिचकता है जो उसे कर्तव्य से विमुख कर देते हैं। सो व्यक्ति को आसक्ति रहित होने का अभ्यास करना चाहिए।
14.ममता का अभाव
व्यक्ति जब खुद को अन्य के अस्तित्व से पहचाने तो उसके अंदर एक ममत्व का भाव आ जाता है। यह ममत्व उसे दुख तो देता ही है, साथ ही साथ ममता में उलझ कर वह अनर्गल निर्णय भी लेने लगता है जिस कारण से वह अपने मौलिक कर्तव्य से विमुख हो जाता है।
15.प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
आसक्ति और ममत्व से मुक्त व्यक्ति हर स्थिति में चाहे वह स्थिति मनोकुल हो या न हो संयमित बना रहता है। उसे न प्राप्ति से सुख होता है न विलगाव से दुख। सुख और दुख, लाभ और हानि जैसे द्वामदात्मक युग्मों से मुक्त व्यक्ति हर स्थिति में एक भाव रहकर निर्णय लेने और कर्तव्य निर्वहन में सक्षम होता है।
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