श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 8

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌।। ।।8।।

इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।

10.भोगों में आसक्ति का अभाव
          जब व्यक्ति इंद्रियों को उनके स्वाभाविक अर्थ में रहने देता है और उनके कर्मों से राग और द्वेष नहीं रखता है तब जाकर उसे सांसारिक सुखों की लिप्सा से छुटकारा मिल पाता है, अन्यथा यदि आप इंद्रियों से संसार के मिलने वाले सुखों की ओर आकर्षित होते हैं तो फिर उन इंद्रियों को उन्हीं कर्मों की तरफ आप बार बार प्रेरित करते हैं। नतीजा यह निकलता है  व्यक्ति उनमें लिप्त होते जाता है और फिर उनके लिए बुरा से बुरा, गलत से गलत आचरण करने में नहीं हिचकता है।

11.अहंकार का अभाव
         जो करते हैं हम ही करते हैं, कर्तापन का यह भाव मन में घमंड भी भरता है और असफलता की स्थिति में निराशा भी, हताशा भी। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति समझे कि कर्ता वो नहीं है और जो कुछ वह करता है वह स्वाभाविक रूप से उंसके कर्म करने के धर्म के कारण करता है। जब इस भाव से व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त होता है तो उसमें कर्तापन का अहंकार नहीं उपजता है।

12जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।
          शरीर अस्थाई है , वस्तुतः व्यक्ति के पास, उंसके इर्द गिर्द जो कुछ है वह सब अस्थाई है। इनसे अनुराग कष्ट के कारण बनते हैं क्योंकि जो मिलता है , उसमें धीरे धीरे , समय के साथ क्षरण होना ही है सो उंसके अनुराग दुख के कारण बनते हैं। अतः आवश्यक है कि व्यक्ति शरीर के अवस्थाओं की वास्तविकता से परिचित रहकर उनसे बिना लिप्त हुए रह सके।

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