श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय एक व्यवहारिक प्रशिक्षण (श्लोक रहित)

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय एक व्यवहारिक प्रशिक्षण

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय एक व्यवहारिक प्रशिक्षण

परिचय
        श्रीमद्भागवद्गीता 18 अध्यायों में पूरी होती है। इस प्रकार हम इस सबक के मध्य में हैं। श्रीमद्भागवद्गीता के अध्ययन के और उसकी शिक्षाओं में दक्ष होने के कारणों को एक बार फिर से दुहराते हैं। 
   पहला लक्ष्य रहा है कि हम समझें कि हम हैं कौन? यानी हमारे होने का क्या औचित्य है। दूसरा लक्ष्य है कि हम समझें कि संसार क्या है और तीसरा लक्ष्य है कि हम ईश्वर को समझ सकें।
     जब हम समझते हैं कि हमारा सेल्फ क्या है, संसार क्या है और ईश्वर क्या है तो हम तीनों के बीच के सम्बंध को भी समझ पाते हैं। जब हम ये समझ पाते हैं कि हमारे सेल्फ का संसार से क्या सम्बन्ध है, संसार का ईश्वर से क्या सम्बन्ध है और हमारा संसार और ईश्वर से क्या सम्बन्ध है। जब हम ये समझ पाते हैं तो फिर हम समझ पाते हैं कि हमारा सेल्फ इस संसार का उपयोग ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कैसे उपयोग कर सकता है।
   श्रीमद्भागवद्गीता की शुरुआत अर्जुन के विषादग्रस्त मस्तिष्क की स्थिति के विवरण से शुरू होती है। जब भी हम समस्या में पड़ते हैं तो उस समय सर्वप्रथम हमारी समझदारी प्रभावित होती है।
        प्रथम अध्याय में अर्जुन का विषाद और उसकी दिग्भर्मिता दिखती है तो दूसरे अध्याय से श्रीकृष्ण की शिक्षा प्रारम्भ होती है।  सर्वप्रथम हम ये समझते हैं कि व्यक्ति शरीर नहीं है बल्कि एक चेतना है जो उसके सेल्फ से यानी आत्मा से अभिव्यक्त होती है। उसके बाद हम समझते हैं कि हमारी चेतना उस विस्तृत चेतना की ही अभिव्यक्ति है जिसे हम ईश्वर कहते हैं। यह जगत भी उसी ईश्वर का विस्तार है जिसे अपरा प्रकृति कहते हैं, जो जड़ है, भौतिक है। परा प्रकृति ईश्वर की चेतन प्रकृति है। इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और व्यक्ति दोनों ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं। व्यक्ति उस परम चेतना को जिसका वह अंश है उसे तब प्राप्त कर पाता है जब उसे ईश्वर की प्रकृति का ज्ञान होता है। यह ज्ञान उसे इस संसार में कर्मयोग का आचरण कर ही प्राप्त होता है। इस प्रकार व्यक्ति के लिए संसार का बहुत महत्व है। यदि वह इस संसार में कर्मयोग का आचरण कर ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त कर पाता है तो उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है। यदि वह इस अवसर को गंवा देता है तो फिर वह उलझा ही रह जाता है।
          अब इस अध्याय में हम  ईश्वर की चेतन प्रकृति को और आगे समझेंगे।
श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय की शिक्षा

व्यक्ति ज्ञान के अभाव में अगिनत भ्रम में जीता है जिससे उसे तरह तरह का दुख एवम सन्ताप होता है। लेकिन यदि व्यक्ति को सही ज्ञान मिल सके, ऐसा ज्ञान जिसे समझ सके और जिसका अनुसरण कर सके तो उसके समस्त दुख एवम सन्ताप दूर हो जाते हैं। यही ज्ञान गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा विभिन्न श्लोकों में दिया गया है। दरअसल यह ज्ञान इस मामले में गुप्त है कि इसे सतही तौर पर तो सब जानते हैं लेकिन इसके वास्तविक महत्व को विरले ही पहचानते है और  बहुत कम ही हैं जो इस ज्ञान को अनुसरण कर अपना पाते हैं। 
          यह ज्ञान हर दृष्टिकोण से सर्वोत्तम है क्योंकि एक तो यह ज्ञान हमेशा के लिए सही है और दूसरा कि इसका अनुसरण करना  भी सहज है। लेकिन जब तक हम इसे जानते नहीं और जानकर इसका अनुसरण नहीं करते हैं तब तक यह हमारे लिए अप्राप्य ही है।


किसी भी तरह का ज्ञान हम तभी प्राप्त करते हैं जब हमें ज्ञान और ज्ञान देने वाले दोनों पर श्रद्धा होती है। श्रद्धा का अर्थ है कि विश्वास भी हो और उस विश्वास के अनुरूप उस ज्ञान का जीवन में अनुसरण भी किया जाए। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो ज्ञान की प्राप्ति की न तो उत्कण्ठा ही होगी और न ही उसे सुनने जानने के पश्चात उसका अनुसरण ही हम कर पाएंगे। गीता के ज्ञान के साथ भी यही बात है। यदि इसमें श्रद्धा है तब तो हम इस ज्ञान को समझ कर ईश्वर को प्राप्त कर पाते हैं और यदि श्रद्धा न हो तो फिर दुनियावी चक्कर में पड़े रह जाते हैं।



परमात्मा ही सब का कारण भी है और सब का परिणाम भी है। परमात्मा की व्यापकता को समझने के लिए हमें तीन बातें समझनी होंगी।
1. ईश्वर सर्वव्यापी है अर्थात ईश्वर इस संसार के हर कण में मौजूद है।

2. इस जगत का हर कण ईश्वर में विद्यमान है अर्थात वह अपने अस्तित्व के लिए परमात्मा पर निर्भर है।

3.ईश्वर सर्वव्यापी होकर भी अपनी उपस्थिति, अपने होने के लिए इस संसार के किसी भी सजीव या निर्जीव, व्यक्त या अव्यक्त पर निर्भर नहीं है।
  4.वस्तुतः ईश्वर की वास्तविक प्रकृति के अनुसार, जगत ईश्वर में नहीं बसता है।
      प्रथम चरण में जब हम सन्सार  के प्रति जागरूक होते हैं तो समहते हैं कि समस्त जगत में ईश्वर व्याप्त है।इस प्रकार इस जगत में जो है वह ईश्वरीय उपस्थिति से परिपूर्ण है। सब कूछ ईश्वर के समर्थन से है।
   दूसरे चरण में हम समझते हैं कि यह समस्त संसार ईश्वर में बसता है यानी अपनी उपस्थिति हेतु ईश्वरीय अनुकम्पा पर निर्भर करता है।
     तीसरे  चरण में हम समझ8ते हैं कि ईश्वर की उपस्थिति  संसार से मुक्त है अर्थाय ईश्वर इसलिए नहीं है क्योंकि सन्सार है। संसार रहे कि न रहे, ईश्वर हमेशा से है और बना रहेगा। ईश्वर की उपस्थिति के लिए संसार की कोई जरूरत नहीं होती है।
   चौथे  चरण में हम समझते हैं कि ईश्वर में कोई सन्सार  नहीं बसता है।अध्यात्म के चरम पर हम समझ पाते हैं कि कंही कुछ भिन्न नहीं है बल्कि सबकुछ में एक सत्य ही है। ऐसा कुछ भी नही है जिसे इस सत्य से भिन्न संसार के रूप में देखा जा सके। इसीलिए ये समझना जरूरी है कि भले ईश्वर समस्त जगत का कारण है, वही उसका पालन करता है लेकिन वह उसमें रहता नही है, अपनी उपस्थिति के लिए इस संसार पर निर्भर नहीं करता है। बल्कि यह संसार तो मात्र उसकी एक अभिव्यक्ति भर है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यह संसार ईश्वर से है, न कि ईश्वर संसार से है। ईश्वर संसार में होकर भी नहीं है। इस तथ्य को न तो इन्द्रियाँ समझ सकती हैं , न ही बुद्धि और न ही विवेक। इसे मात्र और मात्र श्रद्धायुक्त होकर ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करने वाला ही समझ सकता है। 
इन सारे तथ्यों को यूं समझे कि
   God pevades me. I depend on God and God doesn't depend on me. I'm in God. God is independent of me for His existence. God is independent of my Ego. So when Ego gets dissolved God remains .In God there is no I , that means in God there is no Ego. There is no ego, no body, no mind. God is alone.



ईश्वर और जीव में वैसा ही सम्बन्ध है जैसा स्पेस(आकाश) और वायु में होता है। स्पेस इन्द्रियों से अनुभूति में नहीं आता है किंतु  हर चीज स्पेस में ही होता है। इसी का उदाहरण लेकर हम समझ सकते हैं कि इस संसार में जो कुछ है वह इसी निराकार स्पेस में उत्पन्न होता है। ईश्वर ही चेतन स्पेस है जो अनुभूति में नहीं आने के बावजूद सभी चीजों को उत्पन्न करता हुआ भी उन समस्त से विलग होता है।

इस तरह से स्पष्ट है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर में सभी की उत्पत्ति और सृष्टि के अंत में उनके सभी के अंत का कारण है। सभी उसी से निकलते हैं और पुनः अंत में उसी परम् ईश्वर में विलीन हो जाते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।
      ईश्वर बारम्बार इस जगत की रचना करते हैं। बारम्बार जीव  उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म की अपरा प्रकृति यानी माया से जगत की बारम्बारता बनी रहती है। प्रकृति जड़ है, ब्रह्म चेतना उसे गति प्रदान करती है, सो ईश्वर इस प्रकृति के अधीन जीव की बारम्बार रचना करते हैं। जीव के पास कोई विकल्प नहीं होता है। उसे बार बार इस जगत में आना होता है। और जीव अपने स्वभाव के अनुरूप सुख और दुख का अनुभव करता है। किंतु जब जीव ईश्वरीय चेतना से तादम्य स्थापित कर लेता है, तब वह अपनी बुद्धि, अपने विवेक से स्वतंत्र होकर ब्रह्म चेतना के अधीन होकर इन विभिन्न सुख दुख के अनुभव से मुक्त हो जाता है। जीव की रचना उसके कर्मों के अनुरूप होती है और कर्मों से मुक्ति ही ब्रह्म चेतना की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

सूर्य की रौशनी से सभी प्रकाशित होते हैं। सूर्य के उदय के साथ जो भी सूर्य की परिधि में आता है प्रकाशित होता ही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सूर्य द्वारा दूसरों को प्रकाशित किया जाना, सूर्य का प्रयास सहित किया गया कर्म नहीं है बल्कि यह सूर्य की स्वाभाविक प्रकृति है। इस एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि संसार का नियमित संचालन, जन्म, पालन और मृत्यु के चक्र को चलाते रहना , ये ईश्वर के द्वारा  किसी उद्देश्यपूर्वक , किसी स्वार्थ वश किये जाने वाले कर्म नहीं हैं बल्कि यह ईश्वर की प्रकृति का ही हिस्सा हैं। और इसी कारण इन कर्मों को करने के बावजूद ईश्वर को न तो कर्म बाँध पाते हैं और न ही कर्मफल। यही कर्मयोग की शिक्षा भी हमें समझाती है कि जब आप कर्म करें तो कर्मफल से बन्धें नहीं, बल्कि आपके कर्म स्वाभाविक रूप से होने चाहिए।

प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनती है, तमोंगुण, रजोगुण और सत्वगुण। तमोगुण आवरण का प्रतीक है तो रजोगुण भ्रम का। सत्वगुण इन आवरण और भ्रम को हटाकर सत्य का ज्ञान देता है। ईश्वर की प्रकृति में इन तीनों गुणों का समावेश होता है, जिनसे इस संसार के समस्त चर और अचर की उतपत्ति होती है, उनका पोषण होता है और फिर विनाश। और फिर से ये चक्र चलता रहता है। ईश्वर स्वयम कुछ भी नहीं करता हस बल्कि उसकी परा प्रकृति ये सब करती है और ईश्वर मात्र द्रष्टा बनकर, साक्षी बनकर इन परिवर्तनों को होते देखता है। किंतु उसकी उपस्थिति इनके होते रहने के लिए अनिवार्य है। इसे आप सरल तरह से कंप्यूटर के उदाहरण से समझ सकते हैं। कंप्यूटर अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के द्वारा अपने कार्यों को करता है। लेकिन ये सभी तभी तक कार्य करते हैं जब तक विद्युत की उपस्थिति बनी रहती है। विद्युत आपूर्ति बंद होते ये सारे कार्य बंद हो जाते हैं। विद्युत स्वयम कुछ नहीं करता है किंतु उसकी उपस्थिति कंप्यूटर द्वारा कुछ भी किये जाने के लिए अनिवार्य है। इसीप्रकार ईश्वर स्वयम कुछ नहीं करता है किंतु संसार के संचालन के लिए उसका होना ही पर्याप्त है। ईश्वर परम् चेतना है। मनुष्य और ईश्वर में इसका कोई भेद नहीं होता है। मनुष्य जब तक तमोगुण और रजोगुण के अधीन होता है उसे लगता है वही सब कुछ कर रहा है। किंतु जैसे जैसे उसपर से इन दो गुणों का प्रभाव कम होते जाता है और वह सत्वगुण के ज्यादा समीप आते जाता है उसे ज्ञात होते जाता है कि यह तो उसकी चेतना है जो द्रष्टा है । वास्तव में तो कर्ता उसकी प्रकृति है जिससे उसे पार पाना है। सो ईश्वर का सामीप्य उसे परम् चेतना के सामीप्य से ही मिलता है जो सत्वगुण के अधीन होकर ही मिल पाता है।

ईश्वर संसार के जन्मदाता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं और संसार उनकी परा और अपरा प्रकृति यानी भौतिक प्रकृति और सर्वश्रेष्ठ चेतना से संचालित होती है। किंतु संसार में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जिनको इस सत्य का ज्ञान नहीं हो पाता है। ऐसे लोग भौतिक प्रकृती को ही अंतिम सत्य मान कर जीते हैं सो हमेशा तुक्ष लाभों, लोभों , क्षुधा, ईर्ष्या, आदि की पूर्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान कर चलते हैं और सो हमेशा परम् चेतना की अनुभूति से दूर ही रह जाते हैं। वस्तुतः प्रतेक व्यक्ति के अंदर वह चेतना सुप्त अवस्था में अज्ञानता के आवरण से ढँकी हुई होती है। जो लोग इस आवरण को हटा पाने में सक्षम नहीं हो पाते वे लोग स्वयम के ईश्वरत्व से वंचित होकर जीवन पर्यंत अनाचार, असत्य, हिंसा, लोभ, लालच, ईर्ष्या आदि में डूबे रह जाते हैं और ईश्वर को भी अपनी तरह ही समझ लेते हैं।

जिन लोगों को ईश्वर के वास्तविक चेतना का और इस प्रकार स्वयम के परम चेतना का ज्ञान नहीं होता है वे लोग व्यर्थ के प्रयासों में जीवन व्यतीत कर देते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष दो विकल्प होते हैं , पहला आसुरी गुणों को अपनाने का और दूसरा दैवी गुणों को अपनाने का। ईश्वरीय चेतना से रहित व्यक्ति आसुरी गुणों की शरण में जाता है। इस स्थिति में वह अत्याचारी, अहंकारी, असत्यभाषन करने वाला होता है और भ्रम और मोह के जाल में उलझा हुआ होता है। ऐसे लोग जो भी ज्ञान अर्जित करते हैं वे सब निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि उनका ज्ञान किसी की अच्छाई के लिए नहीं होता है। उनके सारे कर्म भी इसी दिशा में संचालित होकर व्यर्थ होते हैं। और ऐसे व्यक्ति जो उम्मीद पालते हैं वे उम्मीद भी निरर्थक ही होते हैं। बिना ईश्वरीय चेतना और बिना  स्वयम के परम चेतना को जाने समझे व्यक्ति आसुरी गुणों से ओत प्रोत जीवन पर्यंत निरर्थक के प्रयास में लगा हुआ रह जाता है, निरन्तर माया, मोह में उलझा काम, क्रोध, ईर्ष्या, जलन, अत्याचार, अनाचार, असत्य, हिंसा में लिप्त हुआ रह जाता है। वह मात्र और मात्र भ्रम में ही जीता रह जाता है।

सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। पहले तरह के व्यक्ति आसुरी गुणों पर निर्भर होकर  गलत प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं और पूरे जीवन भर कर्मबन्धन में पड़े होते हैं। दूसरी तरफ वे व्यक्ति होते हैं जिनमें दैवी गुण ज्यादा बलवती होते हैं। ऐसे लोग निरन्तर ईश भजन में लगे होते हैं। वे सभी जीव में अपनी ही आत्मा का प्रसार देखते हैं और ईश्वर को सभी प्राणियों के परम चेतना स्वरूप जानकर ये मानते हैं कि एक  ईश्वर ही सभी का रचयिता है, वही सभो में समान रूप से व्याप्त है। ऐसे लोगों के हृदय हमेशा ईश्वर को स्मरण और नमन करने में लगे होते हैं।


दैवी सम्पत्ति से परिपूर्ण व्यक्ति बारम्बार ईश्वर को नमन करता हुआ, बारंबार उनके समक्ष, उनकी महानता के समक्ष अपने अहम को त्यागता हुआ उनपर ही स्वयम को अर्पित करता है। उसे हर चीज में ईश्वर की प्रभुता का भान होता है। इसप्रकार ईश्वर की महानता के आगे वह उनकी उपासना में अपना अहम त्याग कर उनमें लीन हो जाता है। उसके लिए हर जगह, हर व्यक्ति में ईश्वर ही विद्यमान दिखते हैं।

ईश्वर की उपासना के कई तरीके होते हैं । सर्वश्रेष्ठ तरीका है ईश्वर को जानना यानी ईश्वर की अनुभूति अपनी समझ , अपनी बुद्धि, अपनी भावना से करना। इस तरीके से व्यक्ति अपनी मूर्खता का, अपनी अज्ञानता का हवन कर ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझता है। यही ज्ञान यज्ञ है। 
      कई अन्य व्यक्ति भी होते हैं जो ईश्वर को विभिन्न स्वरूप के देवी-देवताओं के रूप में उपासते हैं लेकिन उनके अंदर भी यह समझ होती है कि सभी स्वरूप ईश्वर के ही प्रतिरूप हैं, कोई भेद नहीं है।
      कुछ अन्य ऐसे भी होते हैं जो सम्पूर्ण जगत में सबकुछ में ईश्वर को ही पाते हैं। उनकी समझ इस स्तर की होती है कि वे सभी को ईश्वर का ही प्रतिरूप मान कर किसी से  भी कोई भेद नहीं करते हैं।


ईश्वर की प्रकृति को समझें। हम जो भी करते हैं, जैसे कि हम पूजा उपासना करते हैं उनमें भी ईश्वर ही हैं । पूजा, यज्ञ, यज्ञ सामग्री, हवन सामग्री, यज्ञ के मंत्र , घी, अग्नि और यज्ञ की सम्पूर्ण क्रिया और कुछ नहीं ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं। यह समझ हमें प्रेरित करती है कि हम जब भी और जो भी करें उसमें शुचिता को बनाये रखें, हमारी सोच, हमारे व्यवहार, हमारे कर्मों में ईश्वर ही बसते हैं सो उनकी शुचिता को बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी हमारा ही है।  

ईश्वर की प्रकृति को समझें कि ईश्वर का कोई कारण नहीं  है लेकिन ईश्वर इस जगत के कारण हैं। ईश्वर ही पुरुष और प्रकृति दोनों है। इस सम्पूर्ण संसार के होने के पीछे समस्त पिता और समस्त माता एक ईश्वर ही है, जिसका कोई माता या पिता नहीं होते। सो संसार के पितामह भी एक ईश्वर ही हैं। इस प्रकार ईश्वर ही सब कुछ के कारण हैं।
     ईश्वर ही धाता भी हैं अर्थात ईश्वर इस संसार के होने के कारण मात्र ही नहीं होते हैं बल्कि इसके भरण पोषण के भी उत्तरदायी हैं और कर्मों के फलदाता भी हैं। प्रत्येक की आवश्यकता और प्रत्येक के कर्मों के फलदाता भी हैं।
     इस संसार में जो जानने योग्य है अर्थात जो वेद है  वह भी परम ईश्वर हीं हैं और उन वेदों को जानने हेतु आवश्यक ज्ञान यानी ॐ भी वही हैं।
      सारांशतः हम समझें कि ईश्वर ही स्वयं का कारण हैं, वही इस संसार की उतपत्ति , उसके भरण-पोषण, उसके ज्ञान और संस्कार को देने वाले भी हैं और वही एकमात्र जानने योग्य भी हैं और जानने के मार्ग यानी ॐ भी वही हैं।

ईश्वर की प्रकृति के ज्ञान को और समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य जिसे उसे पाना है वह ईश्वर है जिससे मिलकर व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। अंतिम लक्ष्य तक कि इस पूरी यात्रा में यात्री को पूरी यात्रा के दौरान देख भाल , उसका भरण पोषण भी करने वाला ईश्वर ही है। ईश्वर ही सभी के स्वामी भी हैं, सब उनके अधीन हैं, वे प्रभु हैं।  ईश्वर संसार के हर गतिविधि के साक्षी भी हैं। सभी चर-अचर ईश्वर में ही निवास करते हैं और ईश्वर ही सभी के सहारा भी हैं और सभी के मित्र  भी यानी सभी का ख्याल करने वाले हैं। ईश्वर अपने उपकार के बदले में कुछ नहीं चाहने वाले हैं। सभी उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में वापस मिल जाने वाले होते हैं। संक्षेप में कहें तो ईश्वर ही एकमात्र कारण और एकमात्र परिणाम हैं।

श्रीकृष्ण इस बात पर बार बार बल देते हैं कि इस संसार में जो कुछ है, वह सब ईश्वर का ही रूप है और इसी बात को समझाने के क्रम में परमात्मा को ग्राह्य करने हेतु वे उन उदाहरणों को देते हैं जिनको हम अपने इन्द्रियों से अनुभव कर पाते हैं। इसी क्रम में हम ये तथ्य उदाहरण के द्वारा समझते हैं कि सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा, वर्षा, यँहा तक कि जीवन और मृत्यु, सत और असत, प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी कुछ ईश्वर ही हैं। कोई दूसरा नहीं होता है जिसके कारण में ईश्वर न हो। ये समझ हमें सभी चीजों और भावों में समान भाव से बनाये रखती है क्योंकि हम जँहा भी हैं, यंहा तक कि देहावसान में भी ईश्वर के ही साथ हैं।
      इस प्रकार हमें ये शिक्षा मिलती है कि इस संसार में भेद करने लायक कुछ भी नहीं है क्योंकि सभी कुछ ईश्वरमय ही तो है, हम सभी उसी के प्रतिरूप तो हैं सो हमारा हर आचरण दैवी सम्पदा से पूर्ण हो इसका ध्यान रखना हमारा परम् कर्तव्य बन जाता है।

 कर्मयोग, भक्तियोग(उपासना)  और ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले का क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर उस व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। जब व्यक्ति धर्म के तीनों चरण को निष्ठा पूर्वक मानता है , वह कर्मयोग , भक्तियोग और ज्ञानयोग में क्रमशः आस्था रखता हुआ जीवन जीता है तो भी यह सम्भव है कि वह अपने कर्मयोग और उपासना के मार्ग में निष्काम नहीं बना रहे बल्कि अपने उत्थान, अपने हित को ध्यान में रखकर आचरण करे और ज्ञानयोग की शिक्षा को भी अपने लाभ हेतु ही समझे। इस सकाम भाव से कर्म और भक्ति का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को उसका लाभ सांसारिक उपलब्धियों के रूप में मिलता है यानी उसका जीवन भौतिक रूप से ज्यादा ऐश्वर्यशाली हो जाता है। उसे अंतिम मुक्ति तो नहीं मिलती फिर भी उसके जीवन में सांसारिक सुखों और ऐश्वर्य की कमी नहीं होती है। 
     अगर इसी बात को हम उलट कर समझें तो समझना होगा कि यदि कोई व्यक्ति मोक्ष की कामना नहीं कर ऐश्वर्य और सुख की भी कामना करता है तो भी उसका आचरण सही होना चाहिए । आसुरी गुणों से युक्त आचरण करने वाले व्यक्ति को यह स्वर्ग तुल्य सुख और ऐश्वर्य भी नहीं मिल पाता है। आचरण में कर्म के प्रति योगयुक्त प्रवीणता, यज्ञभाव और इष्ट के प्रति, लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और इष्ट के स्वरूप का ज्ञान तो इस भौतिक सुख के लिए भी अनिवार्य है वर्ना आसुरी गुणों से प्राप्त ऐश्वर्य तो कष्ट ही देते हैं।
      किन्तु जब ये कर्म बिना अपने लक्ष्य, बिना अपने इष्ट के प्रति प्रेम और समर्पण रखे सिर्फ लाभ के लिए किए जाते हैं तो लाभ तो मिलता है लेकिन कर्म का प्रभाव खत्म होना ही होता है और वह खत्म होता भी है और फिर व्यक्ति अपने पुराने प्रारम्भिक विंदु पर पहुँच जाता है। सकाम कर्म का जिसमें इक्षाएँ रची बसी होती हैं उनका अगर अच्छा परिणाम मिलता भी है तो वह सांसारिक ही होता है, उससे  व्यक्ति की यात्रा खत्म नहीं होती और ये परिणाम भी सीमित समय के लिए ही होते हैं।

सकाम कर्म करने वाले व्यक्ति के विपरीत जो व्यक्ति पूर्ण निष्काम भाव से कर्म करता है, जिसके कर्म में यज्ञ की उद्दात्त भावना रहती है और जो हर फल को ईश्वर को समर्पित किये होता है तथा जिसके लक्ष्य में मात्र और मात्र प्रभु होते हैं उस व्यक्ति की सभी भावों से रक्षा और हित स्वयम प्रभु ही देखते हैं। जब फल से योग भाव के साथ विमुक्त हो ही गए तो फिर फलों का असर कैसा। एक ईश्वर ही आपके सभी कर्मों के फल में होते हैं तो वही आपका सर्वांगीण हित भी बचाते हैं।

जब व्यक्ति के अंदर इक्षाएँ बलवती होती हैं तो वह उनकी पूर्ति के लिये तरह तरह के उपाय भी करता है । एक आस्थावान व्यक्ति अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु बिना योग को पूरी तरह समझे लेकिन योग के आचरण का प्रयास करता हुआ प्रयत्नशील होता है तो वह अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु भिन्न भिन्न देवी देवताओं की शरण में जाता है। वह परम पिता परमेश्वर में निष्काम भाव से लीन न होकर सकाम भाव से कर्मकांडों को करता हुआ विभिन्न देवी देवताओं की पूजा करता है। यह समर्पण उस व्यक्ति को उस परम पिता परमेश्वर से तो नहीं मिला पाता किन्तु उसके सकाम कर्म उसे फल अवश्य देते हैं।
      यह सही है कि भिन्न भिन्न देवी देवता परम् ईश्वर के ही भिन्न भिन्न ऐश्वर्य के प्रतिनिधि हैं किंतु वे सम्पूर्ण परमात्मा तो हैं  नहीं। जैसे आँखों से देखा जा सकता है, जिह्वा से बोला जा सकता है , नासिका से सूँघा जा सकता है , कानों से सुना जा सकता है,आदि आदि किन्तु ये अलग अलग अंग अलग अलग कर्म करते हुए भी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण पहचान नहीं होते उसी प्रकार अलग अलग देवी देवता व्यक्ति के अलग अलग इक्षाओं की पूर्ति तो कर सकते हैं किंतु वे उस व्यक्ति को परमात्मा का सम्पूर्ण परिचय नहीं दे पाते हैं। हमें अंग्रेजी की वो कहावत ध्यान में रखनी चाहिए कि  whole is better than sum of total.  ईश्वर को समझने का यह तरीका व्यक्ति को ईश्वर के करीब नहीं ले जाता है क्योंकि एक सकामी व्यक्ति अपनी इक्षा पूर्ति में ही भिन्न भिन्न देवी देवताओं में भटक कर रह जाता है।

भिन्न भिन्न देवी-देवताओं को अलग अलग समझकर उनकी पूजा करने वाले ये नहीं समझ पाते हैं कि समस्त पूजा तो एक ही ईश्वर के लिए होती है क्योंकि हर पूजा का स्वामी भी वही एक ईश्वर है और वही उसका प्राप्तिकर्ता भी है, कोई अन्य है ही नहीं । ईश्वर के इस एकात्मक मूल को समझे बगैर यदि व्यक्ति किसी देवी देवता भगवान में आस्था रखता है , भिन्न भिन्न आस्थाओं में ईश्वर के अपने अनुसार कल्पित  प्रकार में भेद भाव करता है तो वह अन्य देवी देवता भगवान के प्रति दुराव का भाव रखने लगता है, जिसके दुष्परिणाम में बहुत कुछ गलत कार्य करता है। ऐसे लोग ईश्वर को अपनी कल्पना में सीमित बना लेते हैं और इसी वजह से उनका बार बार पतन भी होता है।

प्रत्येक कर्म का अपना फल होता है जो व्यक्ति के कर्मों के अनुसार उनको प्राप्त होते हैं। जैसी आपकी श्रद्धा होती है वैसे ही आपको फल भी प्राप्त होते हैं। इसी के अनुरूप हमारे उपासना के भी परिणाम प्राप्त होते हैं। जब हमारे कर्म सकाम होते हैं हम किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति की कामना करते हैं। यदि हमारी श्रद्धा और कर्म उस उद्देश्य की पूर्ति परम्  अनुरूप होते हों तो हमें उनकी प्राप्ति होती है, किन्तु जब व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करते हैं हमारी श्रद्धा उस परमात्मा के प्रति होती है जो सबका नियन्ता और प्रभु है और तदनुरूप हमें उस परमात्मा की प्राप्ति होती है। जब कोई इक्षा और कामना ही नहीं होती हो तब कोई बंधन भी नहीं होता है और उस बन्धन में बंधने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। इसके लिए निष्काम कर्म, यज्ञ भाव, ज्ञान और समर्पण की आवश्यकता होती है। तब जीवन में कोई बंधन नहीं रह जाता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को उस परम भाव की प्राप्ति होती है जो अंतिम रूप से सभी का प्रभु है।

ईश्वर के प्रति भक्ति का स्वरूप क्या है, इसे समझना आवश्यक है।  श्रद्धा और प्रेम पूर्वक समर्पण ही भक्ति है। हम सब अपने जीवन में कई तरह के क्रिया कलाप करते रहते हैं जो मुख्यतः  हमारी कामनाओं की पूर्ति के लिए होते हैं। हम अपनी कामनाओं की पूर्ति हेतु लगे होते हैं क्योंकि इससे हमारा अहम यानी हमारा ईगो सन्तुष्ट होता है। ऐसी अवस्था में हमारे कर्म हमी को समर्पित होकर रह जाते हैं। किंतु जब हम अपनी कामनाओं के दायरे से बाहर निकलते हैं तो हमारा ईगो समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में हम जो कुछ करते हैं वह हम अपने लिए करते ही नहीं हैं। हम जो कुछ करते हैं वह इस भाव और इस समझ के साथ करते हैं कि सब कुछ परम् पिता परमेश्वर का ही है। उसी की इक्षा और उसी की आज्ञा से हम उनका उपभोग कर रहे हैं सो हम अपने कर्मों को उन्हीं को समर्पित करते हैं। इस भाव और समझ के साथ किया गया कर्म ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित होता है, उसमें रत्ती भर भी स्वार्थ नहीं होता है, उसमें रत्ती भर भी अपना ईगो नहीं होता है। 
    और जब इस भक्ति भाव के  समर्पण के साथ कुछ भी करते हैं ईश्वर उनको स्वीकार कर लेते हैं । समर्पण के साथ किये गए कर्म में हमारा ईगो नहीं होता है। वैसी स्थिति में हमारा अस्तित्व ईश्वर के साथ एकीकृत होने लगता है क्योंकि भक्ति के साथ किये गए समर्पण में व्यक्ति खुद से निकलकर ईश्वर में विलीन होने लगता है। उसके कर्म परम् पिता परमेश्वर को लक्षित कर, उनको ही समर्पित होकर किये जाते हैं और परमेश्वर के द्वारा उनको स्वीकार भी किया जाता है। तब व्यक्ति और ईश्वर के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।

भक्ति की पराकाष्ठा को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जो बात एक श्लोक में कही है उसपर ग्रंथ तक लिखे जा सकते हैं। अति संक्षेप में कहें तो श्रीकृष्ण ने यही समझाया है कि जब इष्ट के प्रति भक्ति हो तो व्यक्ति को चाहिए कि वह जो कुछ भी करे, शारीरिक और मानसिक स्तर पर उसे वह अपने इष्ट के प्रति समर्पित होकर करे यानी उसके हर कर्म में यह भाव हो कि उसका कर्म उसके इष्ट के लिए है, उसके अपने या किसी अन्य के लिए। इष्ट यानी ईश्वर को समझाते हुए श्रीकृष्ण पहले ही समझा चुके हैं कि इस दृश्य और अदृश्य संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें ईश्वर का वास न हो। यानी सब कुछ में ईश्वर ही है और ईश्वर इन सब में होते हुए भी सब से स्वतंत्र सत्ता है। जब हमारे सभी कर्म ईश्वर को ही समर्पित होंगे तो फिर हमसे अनाचार,अत्याचार, हिंसा जैसी कोई भी बुरा कर्म हो ही नहीं सकता है। भक्ति तो इंसान को ईश्वर में उसके कर्मों के माध्यम से विलीन कर देती है।

इक्षाओं और कामनाओं के जाल में उलझा व्यक्ति निरन्तर एक पर एक कर्म करते रहता है और इस संसार से बंधकर रह जाता है। उसे इस बात का भान तक नहीं होता है कि वह खुद के सेल्फ से अनजान होकर अपने ईगो को संतुष्ट करने में जीवन भर लगा रह जाता है जबकि वास्तविकता यह है कि वह भी उसी ईश्वर का अंश है जिसकी चाहत उसे होती है। 
       इस भ्रम से बाहर निकलने का मार्ग श्रीकृष्ण समझाते आ रहें हैं। इसके लिए जो मार्ग वे सुझा रहें हैं उस मार्ग में एकसाथ दो उपाय करने हैं, सन्यास और योग। 
        कामनाओं के वश में होकर ही तो कर्म करते हैं , सो कामनाओं को त्यागे। कर्म तो करें लेकिन वे कर्म इक्षा के वशीभूत होकर न करें। इक्षापूर्ति विहीन कर्म ही सन्यास है ।
     यह भी जानें कि प्रत्येक चर अचर में ईश्वर का वास है लेकिन वे उसे समझ नहीं पाते क्योंकि ईगो की परत से ये सत्य ढँका हुआ है। जैसे जैसे अपना ईगो छोड़ते जाएँगे, आप खुद के ईश्वरत्व से परिचित होते जाएंगे, उसके समीप आते जाएंगे और अंततः उसी में विलीन होकर मुक्ति को प्राप्त करेंगे।
        इन दो उपायों को करने का सबसे सरल रास्ता है कि आप खुद को अभ्यास कर सिखाएँ कि आप जो कुछ कर रहें होते हैं उसका एकमात्र कारण इष्ट हैं और वही इष्ट आपके सभी कर्मों का अभीष्ट भी है। जब सारी कामना इष्ट पर टिक जाती है और यह समझ बन जाती है कि समस्त दृश्य और अदृश्य इष्ट की ही अभिव्यक्ति हैं तो व्यक्ति अपने हर कर्म को ईश्वरीय भक्ति के भाव से ही करता हुआ इष्ट को प्राप्त हो जाता है।

स्पष्ट है कि जीवन में अंतिम रूप से स्थाई खुशी व्यक्ति को तब मिलती है जब वह कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है। कर्मों को छोड़ना कर्म मुक्ति नहीं है बल्कि बिना कामना के कर्मों को करते रहना ही कर्मों से मुक्ति देता है और ये सम्भव होता है कामनाओं से सन्यास और ईश से जुड़ाव से। यानी सन्यास और योग से जो मिलते हैं ईश्वर में समाहित हो जाने की सीमा तक के समर्पण युक्त भक्ति से।
      यह सत्य है कि ईश्वर सब में है, सभी उसी की अभिव्यक्ति हैं किंतु ईश्वर का न तो कोई प्रिय है और न अप्रिय। आपमें ईश्वर का वास तो है किंतु आप उसे तभी खोज पाते हैं जब आप ये चाहते हैं अन्यथा आप तो जीवन भर अपनी कामनाओं और इक्षाओं की पूर्ति में सुख दुख झेलते ही रहते हैं। जब हमारे भीतर ईश्वर के प्रति श्रद्धा, समर्पण, भक्ति की उद्दात्त भावनाएँ जोड़ लगाती हैं, जब हम कर्मफल की चिंता से मुक्त हो जाते हैं तो हम अपने में रहने वाले ईश्वर को जान समझ पाते हैं।  दरअसल ईश्वर तो किसी के प्रति राग और द्वेष नहीं रखते किन्तु जो ईश भक्ति के इस मार्ग में बढ़ते हैं उनको ईश्वर से नजदीकी का बोध होता है और उनको ईश्वर के प्रेम का अनुभव भी होता है।

ईश्वर से सामीप्य और मुक्ति का अधिकार सभी को है। हरेक व्यक्ति को ये अधिकार है कि वह अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर का सामीप्य प्राप्त कर सके। यँहा तक कि दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। तब यह प्रश्न उठता है कि ऐसा कैसे सम्भव है?
      ऐसा सम्भव है क्योंकि ईश प्राप्ति के लिए कोई समय और उम्र की सीमा का बंधन नहीं है। जब कभी भी व्यक्ति को यह ज्ञान हो जाये कि वह गलत रास्ते पर था तब से ही वह अपना रास्ता ठीक कर सकता है। लेकिन इसके लिए शर्त है कि उस व्यक्ति को इस तथ्य का ज्ञान हो जाना चाहिए और उसके अंदर इस बात की दृढ़ता हो जानी चाहिए कि वह अब से ही अपने कर्मों को सुधार कर अपना मार्ग बदल लेगा और वास्तव में अपना मार्ग बदल भी लेता है तो वह ईश प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
     दरअसल प्रत्येक व्यक्ति एक ही ईश्वर की अभिव्यक्त है। हरेक के अंदर ईश्वरत्व की उपस्थिति है किंतु उस ईश्वरत्व के ऊपर उसके ईगो का आवरण पड़ा हुआ रहता है। जब उसे  इसका ज्ञान होता है तो वह अपने निष्काम कर्मों के माध्यम से जिनमें यज्ञ का भाव होता है भक्ति की ओर अग्रसर होता है और अपने ईगो के आवरण को हटा कर ईश्वरत्व को सामने ला पाता है। इस मार्ग पर चलना शुरू करने के लिए पूर्व के उसके दुराचार का महत्व नहीं रह जाता है यदि उसने इस मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया हो तो। सो ईश्वर सब के लिए सुगम है बस आपके मन में ईश को पाने की ललक और आपके कर्मों में एक दृढ़ता होनी चाहिए और भक्ति के प्रति अनन्य अनुराग होना चाहिए।

दृढ़प्रतिज्ञ होकर सन्मार्ग पर चलते हुए ईश्वर की प्राप्ति का कर्म करने वाला व्यक्ति, भले ही वह दुराचारी रहा हो उसकी मति बदल जाती है और वह धर्म का मार्ग अपना लेता है। सन्मार्ग के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ व्यक्ति की सोच बदल जाती है, उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। 
    प्रत्येक व्यक्ति के पास अच्छा और बुरा बनने का विकल्प होता है, अब यह उसके सोचने पर निर्भर होता है कि वह अच्छा बनना चाहता है या बुरा। यदि ईश्वर के प्रति उसकी भक्ति जागृत हो जाती है वह सन्मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसके अंदर की आसुरी शक्तियाँ समाप्त हो जाती हैं और उसको सभी चर-अचर के प्रति उसके मन में प्रेम, करुणा , अहिंसा, निष्ठा जागृत हो जाती है और उसके अंदर किसी के प्रति घृणा नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति ही ईश्वर का भक्त होता है और ऐसा व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता है यानी वह कभी भी पथभ्रष्ट नहीं हो पाता है।

भक्ति की महिमा को बताते हुए श्रीकृष्ण समझा चुके हैं कि दुराचारी भी यदि मनोयोग से दृढ़प्रतिज्ञ हो जाये तो उसका आचरण भी बदल जाता है। दरअसल व्यक्ति का उत्थान उसके अपने हाथों में है।  इसी प्रकार यदि व्यक्ति में तमोगुण की अधिकाई हो(यानी शुद्र श्रेणी का हो) रजोगुण कम हो, लाभ हानि की चिंता करने वाला हो(यानी वैश्य श्रेणी का हो) अथवा व्यक्ति के अंदर लगाव और ममत्व बहुत ज्यादा हो(यानी स्त्री प्रवृत्ति का हो) यदि वह भी निष्काम भाव से भक्तिपूर्वक यज्ञकर्म में प्रवृत्त होता है तो उसके अंदर भी कर्मों के फल के प्रति विरक्ति और इष्ट से जुड़ाव की प्रवृत्ति बढ़ती है और वह भी प्रेम, सद्भाव, सत्य, अहिंसा आदि के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके अंदर से लगाव, लोभ, ईर्ष्या, घृणा जैसे आसुरी गुण विलुप्त होने लगते हैं जिससे वह व्यक्ति भी अपने सेल्फ के ऊपर पड़े ईगो के आवरण को हटा कर अपने अंदर बसे ईश्वरत्व को पहचान पाता है और ईश्वर को ही प्राप्त होता है। 

निष्काम भाव से इष्ट के प्रति समर्पण से व्यक्ति को परम् सुखदायी अनुभूति होती है। मनुष्य का शरीर पाकर यह व्यक्ति पर निर्भर होता है कि वह किस प्रकार का कर्म करना चाहता है। जब व्यक्ति को यह लगता है कि वही समस्त परिस्थितियों का स्वामी है तब उसमें अहंकार का भाव तो आता ही है साथ ही वह स्वेक्षाचारी होकर क्रोध, घृणा, लोभ, जैसे बर्ताव में लीन हो जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने शरीर को अपनी मुक्ति का साधन बना लेता, अपने सद्गुणों का विकास करते जाता है, दूसरों के प्रति प्रेम, क्षमा आदि का भाव रखता है, अत्याचार और अनाचार का प्रतिकार करता है और अपने सभी कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित कर बिना फल के प्रति लगाव रखे करता है वह व्यक्ति जीवन में सबसे स्थाई सुख और शांति को प्राप्त करता है। यही सुख और शांति उसे ईश्वर का सामीप्य प्रदान करती है।
      श्रीकृष्ण के अनुसार इस उत्थान के मार्ग पर अनाचारी और दुराचारी तो बढ़ ही सकते हैं यदि उन्होंने स्वयं में परिवर्तन का संकल्प लिया हो  तो फिर ब्राह्मण और क्षत्रिय जिनमें सत्वगुण की प्रबलता होती है वे तो निश्चित ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं अर्थात ईश्वर के प्रिय होते हैं। लेकिन ऐसे ब्राह्मण और क्षत्रिय वही हैं जिनमें सत्वगुण की अधिकता हो या पर्याप्त सत्वगुण के साथ रजोगुण हो। 
      जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है तो उसे निश्चित ही ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्मों को करना चाहिए।

श्रीकृष्ण मानव कल्याण के इस अध्याय को समाप्त करते हुए पुनः समझाते हैं कि व्यक्ति का कल्याण किस तरह से सम्भव हो सकता है। इस हेतु उन्होंने चार कदम बताये हैं।
1. व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर में अपना मन लगाए यानी उसका मन मस्तिष्क ईश्वर में रमा रहे। ईश्वर कोई एक रूप की इकाई नहीं है। वह तो हर चर-अचर में समान रूप से विद्यमान है सो व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर में मन लगाए कँही और नहीं।

2.व्यक्ति को चाहिए कि अपने सारे कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करे ताकि उसके कर्मों से सभी का कल्याण हो। वह जो भी करे वह सब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ईश्वर के लिए ही हो। ऐसा करने वाला व्यक्ति बिना भेद भाव किये सभी के प्रति समान भाव से उनके भलाई हेतु कर्म करता है और वही भक्त कहलाता है। 

3.उसके मन में ईश्वर की महानता के प्रति श्रद्धा हो ताकि वह उनके समक्ष झुक सके। इस श्रद्धा से व्यक्ति ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्म करने के लिए प्रेरित होता है।

4. इस प्रकार व्यक्ति को अपना सर्वस्व ईश्वर के प्रति समर्पित होकर जीवन जीना चाहिए।
      इन चार माध्यमों का अनुसरण कर हम ईश्वर को प्राप्त होते हैं और कभी न समाप्त हो सकने वाला आनंद और सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसी के द्वारा हम अपने ईगो को त्याग कर अपनी आत्मा को भी प्राप्त कर पाते हैं और अपनी आत्मा को उसके गनतव्य यानी परम् आत्मा के साथ जोड़ भी पाते हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम




  







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