श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 34

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 34

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥ ।।34।।

मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा। ।।34।।

श्रीकृष्ण मानव कल्याण के इस अध्याय को समाप्त करते हुए पुनः समझाते हैं कि व्यक्ति का कल्याण किस तरह से सम्भव हो सकता है। इस हेतु उन्होंने चार कदम बताये हैं।
1. व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर में अपना मन लगाए यानी उसका मन मस्तिष्क ईश्वर में रमा रहे। ईश्वर कोई एक रूप की इकाई नहीं है। वह तो हर चर-अचर में समान रूप से विद्यमान है सो व्यक्ति को चाहिए कि वह ईश्वर में मन लगाए कँही और नहीं।

2.व्यक्ति को चाहिए कि अपने सारे कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करे ताकि उसके कर्मों से सभी का कल्याण हो। वह जो भी करे वह सब प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ईश्वर के लिए ही हो। ऐसा करने वाला व्यक्ति बिना भेद भाव किये सभी के प्रति समान भाव से उनके भलाई हेतु कर्म करता है और वही भक्त कहलाता है। 

3.उसके मन में ईश्वर की महानता के प्रति श्रद्धा हो ताकि वह उनके समक्ष झुक सके। इस श्रद्धा से व्यक्ति ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्म करने के लिए प्रेरित होता है।

4. इस प्रकार व्यक्ति को अपना सर्वस्व ईश्वर के प्रति समर्पित होकर जीवन जीना चाहिए।
      इन चार माध्यमों का अनुसरण कर हम ईश्वर को प्राप्त होते हैं और कभी न समाप्त हो सकने वाला आनंद और सुख प्राप्त कर सकते हैं। इसी के द्वारा हम अपने ईगो को त्याग कर अपनी आत्मा को भी प्राप्त कर पाते हैं और अपनी आत्मा को उसके गनतव्य यानी परम् आत्मा के साथ जोड़ भी पाते हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः।

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