श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 33

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 33

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌॥ ।।33।।

फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर। ।।33।।

निष्काम भाव से इष्ट के प्रति समर्पण से व्यक्ति को परम् सुखदायी अनुभूति होती है। मनुष्य का शरीर पाकर यह व्यक्ति पर निर्भर होता है कि वह किस प्रकार का कर्म करना चाहता है। जब व्यक्ति को यह लगता है कि वही समस्त परिस्थितियों का स्वामी है तब उसमें अहंकार का भाव तो आता ही है साथ ही वह स्वेक्षाचारी होकर क्रोध, घृणा, लोभ, जैसे बर्ताव में लीन हो जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने शरीर को अपनी मुक्ति का साधन बना लेता, अपने सद्गुणों का विकास करते जाता है, दूसरों के प्रति प्रेम, क्षमा आदि का भाव रखता है, अत्याचार और अनाचार का प्रतिकार करता है और अपने सभी कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित कर बिना फल के प्रति लगाव रखे करता है वह व्यक्ति जीवन में सबसे स्थाई सुख और शांति को प्राप्त करता है। यही सुख और शांति उसे ईश्वर का सामीप्य प्रदान करती है।
      श्रीकृष्ण के अनुसार इस उत्थान के मार्ग पर अनाचारी और दुराचारी तो बढ़ ही सकते हैं यदि उन्होंने स्वयं में परिवर्तन का संकल्प लिया हो  तो फिर ब्राह्मण और क्षत्रिय जिनमें सत्वगुण की प्रबलता होती है वे तो निश्चित ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं अर्थात ईश्वर के प्रिय होते हैं। लेकिन ऐसे ब्राह्मण और क्षत्रिय वही हैं जिनमें सत्वगुण की अधिकता हो या पर्याप्त सत्वगुण के साथ रजोगुण हो। 
      जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है तो उसे निश्चित ही ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्मों को करना चाहिए।

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