श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 31

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 31

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥ ।।31।।

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।

दृढ़प्रतिज्ञ होकर सन्मार्ग पर चलते हुए ईश्वर की प्राप्ति का कर्म करने वाला व्यक्ति, भले ही वह दुराचारी रहा हो उसकी मति बदल जाती है और वह धर्म का मार्ग अपना लेता है। सन्मार्ग के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ व्यक्ति की सोच बदल जाती है, उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। 
    प्रत्येक व्यक्ति के पास अच्छा और बुरा बनने का विकल्प होता है, अब यह उसके सोचने पर निर्भर होता है कि वह अच्छा बनना चाहता है या बुरा। यदि ईश्वर के प्रति उसकी भक्ति जागृत हो जाती है वह सन्मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसके अंदर की आसुरी शक्तियाँ समाप्त हो जाती हैं और उसको सभी चर-अचर के प्रति उसके मन में प्रेम, करुणा , अहिंसा, निष्ठा जागृत हो जाती है और उसके अंदर किसी के प्रति घृणा नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति ही ईश्वर का भक्त होता है और ऐसा व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता है यानी वह कभी भी पथभ्रष्ट नहीं हो पाता है।


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