श्रीमदभागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 30

श्रीमदभागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 30

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्‌।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥ ।।30।।

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। अर्थात्‌ उसने भली भाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है। ।।30।।

ईश्वर से सामीप्य और मुक्ति का अधिकार सभी को है। हरेक व्यक्ति को ये अधिकार है कि वह अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर का सामीप्य प्राप्त कर सके। यँहा तक कि दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। तब यह प्रश्न उठता है कि ऐसा कैसे सम्भव है?
      ऐसा सम्भव है क्योंकि ईश प्राप्ति के लिए कोई समय और उम्र की सीमा का बंधन नहीं है। जब कभी भी व्यक्ति को यह ज्ञान हो जाये कि वह गलत रास्ते पर था तब से ही वह अपना रास्ता ठीक कर सकता है। लेकिन इसके लिए शर्त है कि उस व्यक्ति को इस तथ्य का ज्ञान हो जाना चाहिए और उसके अंदर इस बात की दृढ़ता हो जानी चाहिए कि वह अब से ही अपने कर्मों को सुधार कर अपना मार्ग बदल लेगा और वास्तव में अपना मार्ग बदल भी लेता है तो वह ईश प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
     दरअसल प्रत्येक व्यक्ति एक ही ईश्वर की अभिव्यक्त है। हरेक के अंदर ईश्वरत्व की उपस्थिति है किंतु उस ईश्वरत्व के ऊपर उसके ईगो का आवरण पड़ा हुआ रहता है। जब उसे  इसका ज्ञान होता है तो वह अपने निष्काम कर्मों के माध्यम से जिनमें यज्ञ का भाव होता है भक्ति की ओर अग्रसर होता है और अपने ईगो के आवरण को हटा कर ईश्वरत्व को सामने ला पाता है। इस मार्ग पर चलना शुरू करने के लिए पूर्व के उसके दुराचार का महत्व नहीं रह जाता है यदि उसने इस मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय कर लिया हो तो। सो ईश्वर सब के लिए सुगम है बस आपके मन में ईश को पाने की ललक और आपके कर्मों में एक दृढ़ता होनी चाहिए और भक्ति के प्रति अनन्य अनुराग होना चाहिए।

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