श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 28
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥ ।।28।।
इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं- ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा। ।।28।।
इक्षाओं और कामनाओं के जाल में उलझा व्यक्ति निरन्तर एक पर एक कर्म करते रहता है और इस संसार से बंधकर रह जाता है। उसे इस बात का भान तक नहीं होता है कि वह खुद के सेल्फ से अनजान होकर अपने ईगो को संतुष्ट करने में जीवन भर लगा रह जाता है जबकि वास्तविकता यह है कि वह भी उसी ईश्वर का अंश है जिसकी चाहत उसे होती है।
इस भ्रम से बाहर निकलने का मार्ग श्रीकृष्ण समझाते आ रहें हैं। इसके लिए जो मार्ग वे सुझा रहें हैं उस मार्ग में एकसाथ दो उपाय करने हैं, सन्यास और योग।
कामनाओं के वश में होकर ही तो कर्म करते हैं , सो कामनाओं को त्यागे। कर्म तो करें लेकिन वे कर्म इक्षा के वशीभूत होकर न करें। इक्षापूर्ति विहीन कर्म ही सन्यास है ।
यह भी जानें कि प्रत्येक चर अचर में ईश्वर का वास है लेकिन वे उसे समझ नहीं पाते क्योंकि ईगो की परत से ये सत्य ढँका हुआ है। जैसे जैसे अपना ईगो छोड़ते जाएँगे, आप खुद के ईश्वरत्व से परिचित होते जाएंगे, उसके समीप आते जाएंगे और अंततः उसी में विलीन होकर मुक्ति को प्राप्त करेंगे।
इन दो उपायों को करने का सबसे सरल रास्ता है कि आप खुद को अभ्यास कर सिखाएँ कि आप जो कुछ कर रहें होते हैं उसका एकमात्र कारण इष्ट हैं और वही इष्ट आपके सभी कर्मों का अभीष्ट भी है। जब सारी कामना इष्ट पर टिक जाती है और यह समझ बन जाती है कि समस्त दृश्य और अदृश्य इष्ट की ही अभिव्यक्ति हैं तो व्यक्ति अपने हर कर्म को ईश्वरीय भक्ति के भाव से ही करता हुआ इष्ट को प्राप्त हो जाता है।
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