श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 27

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌॥ ।।27।।

हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर। ।।27।।

भक्ति की पराकाष्ठा को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जो बात एक श्लोक में कही है उसपर ग्रंथ तक लिखे जा सकते हैं। अति संक्षेप में कहें तो श्रीकृष्ण ने यही समझाया है कि जब इष्ट के प्रति भक्ति हो तो व्यक्ति को चाहिए कि वह जो कुछ भी करे, शारीरिक और मानसिक स्तर पर उसे वह अपने इष्ट के प्रति समर्पित होकर करे यानी उसके हर कर्म में यह भाव हो कि उसका कर्म उसके इष्ट के लिए है, उसके अपने या किसी अन्य के लिए। इष्ट यानी ईश्वर को समझाते हुए श्रीकृष्ण पहले ही समझा चुके हैं कि इस दृश्य और अदृश्य संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमें ईश्वर का वास न हो। यानी सब कुछ में ईश्वर ही है और ईश्वर इन सब में होते हुए भी सब से स्वतंत्र सत्ता है। जब हमारे सभी कर्म ईश्वर को ही समर्पित होंगे तो फिर हमसे अनाचार,अत्याचार, हिंसा जैसी कोई भी बुरा कर्म हो ही नहीं सकता है। भक्ति तो इंसान को ईश्वर में उसके कर्मों के माध्यम से विलीन कर देती है।

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