श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 1, 2

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 1, 2

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ ।।1।।

श्री भगवान बोले- तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा। ।।1।।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌॥2।।

यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है। ।।2।।

व्यक्ति ज्ञान के अभाव में अगिनत भ्रम में जीता है जिससे उसे तरह तरह का दुख एवम सन्ताप होता है। लेकिन यदि व्यक्ति को सही ज्ञान मिल सके, ऐसा ज्ञान जिसे समझ सके और जिसका अनुसरण कर सके तो उसके समस्त दुख एवम सन्ताप दूर हो जाते हैं। यही ज्ञान गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा विभिन्न श्लोकों में दिया गया है। दरअसल यह ज्ञान इस मामले में गुप्त है कि इसे सतही तौर पर तो सब जानते हैं लेकिन इसके वास्तविक महत्व को विरले ही पहचानते है और  बहुत कम ही हैं जो इस ज्ञान को अनुसरण कर अपना पाते हैं। 
          यह ज्ञान हर दृष्टिकोण से सर्वोत्तम है क्योंकि एक तो यह ज्ञान हमेशा के लिए सही है और दूसरा कि इसका अनुसरण करना  भी सहज है। लेकिन जब तक हम इसे जानते नहीं और जानकर इसका अनुसरण नहीं करते हैं तब तक यह हमारे लिए अप्राप्य ही है।

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