श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय एक व्यवहारिक प्रशिक्षण

परिचय
        श्रीमद्भागवद्गीता 18 अध्यायों में पूरी होती है। इस प्रकार हम इस सबक के मध्य में हैं। श्रीमद्भागवद्गीता के अध्ययन के और उसकी शिक्षाओं में दक्ष होने के कारणों को एक बार फिर से दुहराते हैं। 
   पहला लक्ष्य रहा है कि हम समझें कि हम हैं कौन? यानी हमारे होने का क्या औचित्य है। दूसरा लक्ष्य है कि हम समझें कि संसार क्या है और तीसरा लक्ष्य है कि हम ईश्वर को समझ सकें।
     जब हम समझते हैं कि हमारा सेल्फ क्या है, संसार क्या है और ईश्वर क्या है तो हम तीनों के बीच के सम्बंध को भी समझ पाते हैं। जब हम ये समझ पाते हैं कि हमारे सेल्फ का संसार से क्या सम्बन्ध है, संसार का ईश्वर से क्या सम्बन्ध है और हमारा संसार और ईश्वर से क्या सम्बन्ध है। जब हम ये समझ पाते हैं तो फिर हम समझ पाते हैं कि हमारा सेल्फ इस संसार का उपयोग ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कैसे उपयोग कर सकता है।
   श्रीमद्भागवद्गीता की शुरुआत अर्जुन के विषादग्रस्त मस्तिष्क की स्थिति के विवरण से शुरू होती है। जब भी हम समस्या में पड़ते हैं तो उस समय सर्वप्रथम हमारी समझदारी प्रभावित होती है।
        प्रथम अध्याय में अर्जुन का विषाद और उसकी दिग्भर्मिता दिखती है तो दूसरे अध्याय से श्रीकृष्ण की शिक्षा प्रारम्भ होती है।  सर्वप्रथम हम ये समझते हैं कि व्यक्ति शरीर नहीं है बल्कि एक चेतना है जो उसके सेल्फ से यानी आत्मा से अभिव्यक्त होती है। उसके बाद हम समझते हैं कि हमारी चेतना उस विस्तृत चेतना की ही अभिव्यक्ति है जिसे हम ईश्वर कहते हैं। यह जगत भी उसी ईश्वर का विस्तार है जिसे अपरा प्रकृति कहते हैं, जो जड़ है, भौतिक है। परा प्रकृति ईश्वर की चेतन प्रकृति है। इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और व्यक्ति दोनों ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं। व्यक्ति उस परम चेतना को जिसका वह अंश है उसे तब प्राप्त कर पाता है जब उसे ईश्वर की प्रकृति का ज्ञान होता है। यह ज्ञान उसे इस संसार में कर्मयोग का आचरण कर ही प्राप्त होता है। इस प्रकार व्यक्ति के लिए संसार का बहुत महत्व है। यदि वह इस संसार में कर्मयोग का आचरण कर ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त कर पाता है तो उसे ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है। यदि वह इस अवसर को गंवा देता है तो फिर वह उलझा ही रह जाता है।
          अब इस अध्याय में हम  ईश्वर की चेतन प्रकृति को और आगे समझेंगे।

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