श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 एक व्यवहारिक प्रशिक्षण श्लोक रहित


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 एक व्यवहारिक प्रशिक्षण श्लोक रहित

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 1 & 2

श्रीकृष्ण ईश्वर को समझाते हुए कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनके अर्थ अर्जुन को स्पष्ट नहीं होते हैं। सो अर्जुन इन शब्दों को समझाने का आग्रह श्री कृष्ण से अनुरोध करता है। ये शब्द हैं-ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म,अधिभूत, अधिदैव, एवं अधियज्ञ।
    इसके अतिरिक्त अर्जुन ये भी समझना चाहता है कि जीवन के अंत समय में  ईश्वर को कैसे समझ पाता है अर्थात ये कैसे सम्भव है कि मृत्यु के समय तक भी ईश्वर को समझ लिया जा सकता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 3 एवं 4

अर्जुन के माध्यम से हमारी शंकाओं को दूर करते हुए श्रीकृष्ण ने समझाया है कि
ब्रह्म---ब्रह्म वो है जो सबसे बड़ा है , जिसमें कभी भी न तो कोई परिवर्तन होता है, अथवा न कभी जिसका क्षय होता है। अर्थात परम् अविनाशी ही ब्रह्म है। यही वो परम् चैतन्य है जो सभी शरीर, मन और बुद्धि यानी सभी मैटर को उनकी चेतना प्रदान करता है।

अध्यात्म-- परम् अविनाशी ब्रह्म सूक्ष्म होते हुए भी सभी में  समान रूप से व्याप्त है। वही सभी को उनकी चेतना प्रदान करता है और इस कारण सभी में एक ही भाव में व्यक्त होता है। यही सभी की आत्मा है यानी ब्रह्म ही प्रत्येक भौतिक स्वरूप में कृपा स्वरूप उनकी क्षमता और सामर्थ्य के रूप में व्यक्त है और इसी को उस भौतिक स्वरूप का स्वभाव भी कहते हैं।

कर्म--ब्रह्म परम् अविनाशी और सर्वव्यापी तो है , साथ ही वह सभी भौतिक स्वरूपों में उनकी चेतना के रूप में व्याप्त भी है। यही चेतना उस भौतिक स्वरूप  की सृजन शक्ति यानी वह सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति जो बुद्धि निर्माण कार्य में प्रवृत्त होकर उस भौतिक स्वरूप के विभिन्न भावों का निर्माण करती है जो कर्म कहलाता है।

अधिभूत--यह संसार पंचमहाभूतों से मिलकर बना हुआ है जिनका निरन्तर क्षय होता रहता है अर्थात जिनका स्वरूप नित्य परिवर्तनशील होता है। यह  परिवर्तनशील संसार और इसको बनाने वाले परिवर्तनशील पंचमहाभूत भी ईश्वरीय सत्ता के ही रूप होते हैं। इस प्रकार ईश्वर अक्षर ब्रह्म से भी व्यक्त होता है और क्षर पंचमहाभूतों से भी व्यक्त होता है।  

अधिदैव--सभी भूतों में उनको जो नियंत्रित करता है वह परम पुरुष अधिदैव होता है और वह भी ईश्वरीय स्वरुप की ही अभिव्यक्ति होता है। जैसे हमारे शरीर में विभिन्न अंग होते हैं जो अलग अलग पहचान तो रखते हैं किंतु उन सब को एक मौलिक तंत्र में हमारा  मैं बन्धता है,  संचालित करता है, और जो हमारे ही मैं की अभिव्यक्ति होते हैं उसी प्रकार परमपुरुष हिरण्यगर्भ ईश्वर सभी चर और अचर को संचालित करता है सो वह सभी में व्याप्त अधिदैव कहलाता है।

अधियज्ञ--व्यक्तिगत जीव को अधियज्ञ कहते हैं जो आत्मा को धारण करता है , जिसका एक शरीर विशेष होता है, जिसकी बुद्धि होती है और जिसका एक विशेष व्यक्तित्व होता है और यह व्यक्तिगत जीव भी और कुछ नहीं उसी ईश्वरीय सत्ता का स्वरूप होता है।
     इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर निराकार, नित्य अपरिवर्तनीय ब्रह्म यानी आत्मा भी है, जो चेतना प्रदान करता है जिसकी वजह से वह कर्म यानी सृजनात्मक क्षमता से भी व्यक्त होता है, वही साकार पँचमहाभूतो को भी और उनसे निर्मित इस साकार संसार और जीव में भी होता है और वही इन सभी चेतना और प्रकृति को , निराकार और साकार के संयोग को संचालित भी करता है। इस प्रकार ईश्वर को समझने के लिए इन सभी छह रूपों को समझना होता है। जैसे जैसे एक एक कर हम इनको समझते जाते हैं हम ईश्वर को समझते जाते हैं , उनको पाते जाते हैं। ईश्वर इन छह रूपों में अलग अलग  समझे जाने के बावजूद सम्पूर्ण रूप से तभी समझ में आते हैं जब इन छहों रूपों को  एक साथ उनकी समग्रता में समझ पाते हैं। यानी whole is better than sum of the parts.

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 5

ईश्वर को समझने और समझ कर उसे प्राप्त करने के मार्ग को सुझाते हुए श्रीकृष्ण ने बतलाया है कि ईश्वर के छह रूपों को आत्मसात करें-एक ईश्वर ही ब्रह्म है, आत्मा है, आपकी सृजनात्मकता है, वही पँचमहाभूतो से निर्मित संसार है, परम् पुरुष है और वही आपका भी शरीर सहित रूप भी है। इस तथ्य को समझ कर जो व्यक्ति हमेशा इन छह स्वरूपों के ध्यान में ,उनके ही स्वरूप में ध्यानमग्न होकर अपनी मृत्यु तक बना रहता है वह ईश्वर को ही प्राप्त होता है। जो जीवनकाल में इन स्वरूपों के मनन चिंतन में लीन हो वही मृत्यु के समय भी उनमें रमा हो सकता है। ऐसा नहीं होता कि जीवन भर कुकर्म करते रहे और अंत समय में ईश्वर चिंतन में लग गए। ऐसा होना सम्भव नहीं होता है क्योंकि व्यक्ति अपने स्वभाव से बंधा हुआ होता है। अंत समय में ईश्वर प्राप्ति का एक ही विधान है कि आप जीवन भर ईश्वर चिंतन में मनोयोग से प्रवृत्त रहें हों।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 6

ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि व्यक्ति अपने जीवन के अंत समय में जिसका स्मरण कर शरीर त्यागता है उसी भाव को प्राप्त करता है। यँहा यह ध्यान देना है कि क्या हम जीवन भर जिस चीज के आदि नहीं रहें हैं उसको जीवन के अंत समय में हठात स्मरण में ला सकते हैं अथवा क्या उस समय उसका अभ्यास कर सकते हैं। उत्तर है , नहीं। यह सम्भव नहीं है कि हम जीवन भर गलत रास्ते पर चले हों और अचानक मृत्यु के समय हम सही मार्ग पकड़ लें। वस्तुतः अंत में सही मार्ग तभी मिलता है जब प्रारम्भ से ही मार्ग सही हो। इस प्रकार शिक्षा ये है कि हमें जीवन के शेष दिनों में भी सही मार्ग पर चलना चाहिए ताकि जब जीवन का अंत समय आये तो भी हम मार्ग भटके नहीं और हमारी दिशा और दशा दोनों सही रहे। यही तथ्य जीवन के सभी आयामों पर सही उतरता है। हमारा प्रयास, हमारे कर्म हर लक्ष्य के प्रति प्रारम्भ से ही सही हों इसका हमें स्मरण रखना चाहिए ताकि जब अंत समय में उस लक्ष्य की पूर्ति हो सके। अचानक रास्ता सुधारने की कोशिश से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 7

बिना कर्मयोग के आचरण के व्यक्ति का कल्याण होना सम्भव नहीं होता है। वही मार्ग है जिसपर चलकर व्यक्ति जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है। कर्मयोग के आचरण में व्यक्ति को कर्मफल से मोह त्याग कर एक उच्च आदर्श के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर अपनी प्रकृति के अनुरूप यानी अपनी क्षमता के अनुरूप कर्म करना होता है। अर्थात व्यक्ति के समस्त कर्म उस आदर्श यानी परम् पुरुष को समर्पित होते हैं। इस तथ्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि हम जब अपनी बुद्धि और विवेक को परम पुरुष के प्रति निरन्तर श्रद्धावान रखकर उसे स्मरण में रखकर ही अपने कर्म करें। ऐसी स्थिति में हम न तो कोई गलत कर्म कर सकते हैं क्योंकि हमारे स्मरण में निरन्तर परमात्मा का ध्यान होता है और हमारे कर्म भी उन्हीं परम् को समर्पित भी होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 8

जब हम ईश्वर को निरंतर अपने मन बुद्धि में रखकर कर्म करते हैं तो निश्चित ही हमें ईश्वर की प्राप्ति होती है यानी हम भी उस पद तक पहुँच पाते हैं। किंतु व्यवहारिक बात ये है कि सिर्फ इस बात का ज्ञान भर हो जाने से ऐसा होता नहीं है। ऐसा होने के लिए ये आवश्यक है कि हम निरन्तर इसका अभ्यास करें। निरंतर अभ्यास से ही हम इस सत्य को आत्मसात कर पाते हैं। इस अभ्यास से ईश्वर को हम उसी तरह चेतन और अचेतन दोनों स्थिति में अपना बना पाते हैं जैसे चेतन और अचेतन दोनों ही स्थिति में अपनी स्थिति यानी अपना नाम, अपना लिंग, अपने परिवार का ज्ञान बना रहता है। हमारे जेहन में ईश्वर की इसी प्रकार की उपस्थिति बारम्बार के अभ्यास से आती है। तब हमें ईश्वर का स्मरण करने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि वह तो हमारे व्यक्तित्व और हमारे सेल्फ का अभिन्न स्वरूप हो जाता है। तब हमें उस परम् पुरुष की स्थिति प्राप्त हो पाती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 9

ईश्वर का निरन्तर चिंतन, मनन कर ईश्वर को प्राप्त तो किया जा सकता है किंतु प्रश्न उठता है कि हम ईश्वर को किस रूप में स्मरण करें, हम सभी कर्म करते हुए भी ईश्वर को किस तरह अपने स्मरण में बनाये रखें कि यह अनुभूति हमारे स्व का अविभाज्य अंश बन जाये।
      इसके लिए आवश्यक है कि हम ईश्वर को उसकी निम्न विशेषताओं से स्मरण में रखें
   1. ईश्वर अपने स्वरूप में सर्वज्ञ यानी सबकुछ जानने वाला है।

2. ईश्वर चिरन्तर, पुराना किंतु नया है यानी ईश्वर सब कुछ के पहले भी था और सब कुछ के बाद भी रहेगा।

3.ईश्वर सब कुछ का नियंत्रक, सब कुछ को नियंत्रण करने वाला, सभी कुछ का कारण है, वह सदा सभी जगह विद्यमान है और सभी कुछ उसी के अधीन है।

4.ईश्वर अति सूक्ष्म, सबसे सूक्ष्म,

नहीं दिखने वाला है जिसे सिर्फ अपनी चेतना से जाना जा सकता है।

5.ईश्वर सबका पालन करने वाला है, सब को धारण करता हुआ ईश्वर सभी का पालनहार है।

6. ईश्वर विवेक और बुद्धि से अग्राह्य है, सिर्फ चेतना ही ईश्वर को देख समझ सकती है।

7.ईश्वर प्रकाश स्वरूप, ज्ञान स्वरूप, स्वप्रकाशित, है उसको किसी से प्रकाशित नही होना है यानी वह स्वयम प्रकाशित है।

8.ईश्वर सभी अंधकार, सभी अविद्या, अज्ञान से परे है।

         जब व्यक्ति की चेतना ईश्वर की इन विशेषताओं को समझती है और उनको अपने व्यवहारिक बुद्धि में उतार लेती है तो ईश्वर की अनुभूति अपने चेतना में सदा सर्वदा के लिए हो जाती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 10

अर्जुन का प्रश्न है कि मृत्यु के समय हम परमात्मा को कैसे प्राप्त कर पाते हैं। दरअसल परमात्मा की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व को प्राप्त करने की कोई क्रिया नहीं है जिसे हम प्राप्त करते हैं। परमात्मा की प्राप्ति का अर्थ है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा को प्राप्त करना जिसे प्राप्त कर हम स्वयं के वास्तविकता को समझ सकते हैं। एक घड़ा है। उस धड़ा के अंदर कुछ स्थान है जिसे घड़े का बाहरी आवरण घेरे रहता है। घड़े के अंदर का स्थान सीमित होता है जो बाहरी स्पेस से घड़े के शरीर से विलग होकर अपना एक अलग अस्तित्व बनाता है। किंतु घड़ा जैसे ही फूटता है उसके अंदर का स्पेस बाहरी स्पेस से मिलकर एक हो जाता है।अपने सेल्फ पर  इसी बाहरी आवरण का हटना ही मृत्यु है और अपने सेल्फ को वृहत्तर सेल्फ से मिलाना ही परमात्मा की प्राप्ति है जो जरूरी नहीं कि शारीरिक मृत्यु से प्राप्त हो ही जाए बल्कि सत्य तो यही है कि व्यक्ति द्वारा अपने बाहरी आवरण यानी ईगो को हटाकर , उसे नष्ट कर आत्मसाक्षसत्कार करना ही ईश्वरत्व की प्राप्ति का मार्ग है।
    इसके लिए आवश्यक है कि
1. व्यक्ति निरंतर कर्मयोग के अनुसार ही आचरण करे।
2. मन में पूर्ण समर्पण की भावना अनिवार्य है। संशय युक्त मन से आस्था जागृत नहीं होती है और आस्था के बिना श्रद्धा नहीं आती और श्रद्धा के अभाव में समर्पण नहीं होता । ऐसी स्थिति में परमात्मा से युक्त होने की श्रद्धा में कमी आती है।
3.श्रद्धा युक्त एकाग्रता होनी चाहिए। मन में भटकाव नहीं आना चाहिए। मन का संतुलित और एकनिष्ठ नहीं  होने से भटकाव का आना तय है और उस स्थिति में आत्मसाक्षात्कार सम्भव ही नहीं है । अतः श्रद्धायुक्त एकाग्रता यानी ध्यान की अवस्था होनी अनिवार्य है।
4.मन में, भाव में, बुद्धि में, विवेक में, सभी कर्मों में ईश्वर की निरन्तर अनुभूति के सत्य का अभ्यास ही व्यक्ति के ईगो को उसके सेल्फ के साथ मिला देता है।
       इसी निरन्तर प्रक्रिया से ही व्यक्ति हर समय ईश चिंतन में युक्त हुआ रह सकता है। वह सब कुछ करते हुए भी सभी कर्मों से विलग उन कर्मों को परम आत्मा को समर्पित कर सन्यास भाव से सब के कल्याणार्थ जीता हुआ ईश्वर और ईश्वरत्व को प्राप्त होता है। इसके लिए भौतिक मृत्यु नहीं बल्कि ईगो की मृत्यु की आवश्यकता होती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 11

व्यक्ति के जीवन के लक्ष्य क्या होते हैं? क्या बहुत पैसा, बहुत बड़ा पद, बहुत अधिक सत्ता, बहुत ऊँचे स्तर की कोई अन्य उपलब्धि? क्या इतने भर से आपको वो चीज हासिल हो जाती है जिससे आपको अपने होने का शकुन मिलता हो? निश्चित ही नहीं क्योंकि इन सबों को  हासिल कर लेने के बाद भी व्यक्ति अपने अधूरेपन के साथ ही जीता है। दरअसल आपकी भौतिक उपलब्धि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जब तक आप खुद को नहीं खोज लेते आपके परिश्रम आपको शांति नहीं दे पाते हैं। इसी चीज को यानी अपनी ही आत्मा को, अपने ही सेल्फ को पाने को ईश्वर की प्राप्ति भी कहते हैं क्योंकि आप ही वास्तव में  ब्रह्म हैं जो आपको नहीं ज्ञात है। 
          इसी ब्रह्म को पाने के विधान को समझने के लिए हम कर्मयोग का मार्ग चुनते हैं, ज्ञानयोग और सन्यास योग का मार्ग चुनते हैं और इसी कड़ी में हम भक्ति योग का भी मार्ग चुनते हैं और ये सभी मार्ग अपने में पूर्ण होते हुए भी एक दूसरे के पूरक भी होते हैं। वेदों के ज्ञाता हों या राग मुक्त सन्यासी महात्मा हों या फिर ब्रह्म प्राप्ति का आचरण करने वाले हों सभी इसी ब्रह्म की प्राप्ति हेतु यत्नशील होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 12 एवं 13

ब्रह्म यानी ईश्वरत्व के परम पद को प्राप्त करने के कर्मयोग और ज्ञानयोग-सन्यास योग मार्ग के अतिरिक्त भक्तियोग का भी मार्ग है। भक्ति वो भावना है जिसमें व्यक्ति अपने प्रेमी में विलीन हो जाने के लिए ततपर होता है। उसमें अपने प्रेमी , अपने आराध्य के लिए इतनी श्रद्धा होती है कि वह उससे विलग नहीं होना चाहता है। तो फिर इसे कैसे सम्भव किया जाता है?
     इसके लिए निम्न प्रकार से उपाय करने होते हैं
1.सबसे पहले व्यक्ति को इंद्रियों से मिलने वाले बाह्य स्पंदनों के प्रभाव से मुक्त होना आवश्यक है।

2.इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त हो लेने के बावजूद इसकी संभावना बनी होती है कि पूर्व के इन्द्रिय भोगों का प्रभाव बना रहे। सो आवश्यक है कि मन स्थिर हो, चंचल न हो और इष्ट के प्रति अचल भाव से हृदय में श्रद्धावान बना रहे ताकि पूर्व के इन्द्रिय भोगों के प्रभाव उसपर नहीं पड़ सकें।

3.अंदर के भाव बाह्य संसार में व्यवहार को विचलित नहीं होने दें। इसके लिए प्राण  का स्थिर होना अनिवार्य है। मन वाह्य भावों से और अंदर उठने वाले भावों से अप्रभावित होकर इष्ट के प्रति लगन से लगा रहे।

4.योगयुक्त आचरण बना रहे।
      इन विशेषताओं से लैस होकर इष्ट के नाम में मन रमा रहे, उस नाम का जप करता रहे। ये नाम बहुत ही छोटा है, उच्चारण में किंतु इसके जप से निकलने वाली ध्वनि मन को स्थिर किये हुए होती है। ये नाम है ॐ। ये नाम राम भी हो सकता है, शिव भी। लेकिन जब व्यक्ति छोटे से नाम से अपने इष्ट का ध्यान करता है तो इष्ट को व्यक्ति के श्वास में उतर कर उसके व्यक्तित्व तक में फैल जाने में आसानी होती है, एकाग्रता बनी हुई रहती है। जब निरन्तर इष्ट के नाम का ही जप ध्यान में रहता है तो इष्ट ध्यान से ओझल नहीं होता है। फिर यही निरन्तर ध्यान व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है और अंत में उसकी पहचान भी। ऐसी ही स्थिति में व्यक्ति अंत तक ईश्वर के यानी इष्ट के सानिध्य में रह पाता है क्योंकि वह तो निरन्तर अपने इष्ट में ही लीन है। इंद्रियों की हलचल, पूर्व के भोग, अंदर और बाहर के भाव उसे छू भी नहीं पाते हैं। यही भक्ति भी है क्योंकि श्रद्धा के साथ नाम जपते जपते व्यक्ति इष्ट के अस्तित्व में ही खुद के भी अस्तित्व को विलीन कर देता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 14

ईश चिंतन का अभ्यास करने से ईश चिंतन व्यक्ति के स्वभाव का, उसकी प्रकृति का अविभाज्य अंग बन जाता है। ईश चिंतन हेतु ईश यानी इष्ट के नाम का निरन्तर चिंतन एक मार्ग है जो सुलभ तो है ही आसान भी है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह हर वक़्त अपने सभी कर्मों को करते हुए भी इष्ट के नाम का स्मरण करता रहे। इससे होता ये है कि एक तरफ तो व्यक्ति निरन्तर खुद को ईश्वर के समीप तो पाता है , साथ ही अपने सभी कर्मों को करने के क्रम में कर्म की शुचिता के प्रति भी सजग रहता है, जिससे उससे कोई पाप कर्म, कोई अनुचित कर्म नहीं होता है। यह प्रवृत्ति उसके अंदर दैवी गुणों को बढाने और आसुरी गुणों को नष्ट करने में भी सहायक होती है। सो हमें अपने इष्ट के नाम का निरन्तर चितन, स्मरण और यथा सम्भव उच्चारण करना चाहिये।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 15

यह संसार नियमित रूप से परिवर्तनशील है और यँहा सब कुछ नश्वर है। इस परिवर्तनशीलता और नश्वरता के कारण नित्य कई दुखों की नियमित  उतपत्ति होती रहती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को बराबर दुखों की अनुभूति रहती है। इस स्थिति से मुक्ति तभी मिलता है जब व्यक्ति का सम्पर्क अविनाशी, अक्षर ब्रह्म से होता है, खुद उस व्यक्ति के अंदर ईश्वरत्व का भाव आता है। निरन्तर इष्ट के प्रति श्रद्धावान बने रहकर उसी में लीन बने रहने वाले व्यक्ति को इंद्रियों द्वारा मिलने वाली वाह्य संवेदनाएं प्रभावहीन हो जाती हैं, और अंदर से जो संकल्प उठते हैं वे इष्ट की तरफ मुड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को दुखों से मुक्ति मिल जाती है। जब व्यक्ति की सारी कामनाएँ इष्ट की तरफ मुड़ जाती हैं तो फिर जन्म-मृत्यु का चक्र भी स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 16

जब व्यक्ति के मन में इष्ट चिंतन निरन्तर बना रहता है, वह इष्ट चिंतन का अभ्यासी हो जाता है तब उसके अंदर दैवी गुणों की वृद्धि होती जाती है और उसके साथ ही वह कामनाओं और इन्द्रिय सुखों के जाल से बाहर निकलता जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति काल से मुक्त परमात्मा का सामीप्य पाता है। उसके अंदर ईश्वरत्व के भाव बढ़ते जाते हैं। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति जन्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, उसे विभिन्न लोकों की इक्षा भी नहीं रह जाती है और वह इन सब से मुक्त होकर परमात्मा में ही समाहित हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 17 एवं 18

नोट-बाद में अपडेट किया जाएगा।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 19

जीवन की निरंतरता हमेशा बनी रहती है। जीवन का मूल स्वरूप एक ही है और वही जीवन भिन्न भिन्न आकार-प्रकार में विद्यमान होते रहता है। इस प्रकार जीवन चक्रिक है, जन्म और मृत्यु उसके दो पड़ाव अवश्य हैं किंतु वे न तो प्रारम्भ हैं और न अंत। वे जीवन की निरंतरता में दो पड़ाव मात्र हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 20

संसार और सृष्टि के समाप्त हो जाने के पश्चात भी परम चेतना का नाश नहीं होता है, बल्कि परम् चेतना समय, काल और स्थान से मुक्त सनातन बनी हुई होती है। यही परम् चेतना सृष्टि के जन्म, उसके पालन और उसके विलोपन का चक्र निरंतर संचालित करते रहती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 21

व्यक्ति के जीवन का परम लक्ष्य परम् तत्व परमात्मा को प्राप्त करना होता है। यह परम् तत्व परमात्मा उस काल में व्यक्ति को प्राप्त होता है जब उसका मिलन सनातन ब्रह्म की प्राप्ति होती है। यह सनातन ब्रह्म अजन्मा है, इसका क्षय नहीं होता और न ही इसका नाश होता है। व्यक्ति परम् तत्व परमात्मा को प्राप्त होकर जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर उन्हीं में विलीन हो जाता है। यह सनातन , अक्षर परमात्मा उस समय प्राप्त होता है जब व्यक्ति के अंदर की समस्त कामनाओं पर विराम लग जाता है और कामना मुक्त व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता हुआ कामना पूर्ति के भार से मुक्त होकर जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है और सनातन अक्षर परमात्मा का ही अंग बन जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 22

ईश्वरीय स्थिति प्राप्त करने के सम्बंध में पूर्व में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और ज्ञानयोग के मार्ग को समझाया है। अब उसी को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण भक्तियोग के मार्ग को समझाते हैं। 
      ईश्वरीय स्थिति ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति से मिलती है यानी बिना किसी शकोसुभहा के जब व्यक्ति ईश्वर ले प्रति श्रद्धा से समर्पित होता है तो उसे वही ईश्वरीय पद प्राप्त होता है जिस ईश्वर की वह आराधना करता है। किसी भी स्थिति में अभीष्ट को प्राप्त करने का यही निष्ठायुक्त श्रद्धा का मार्ग होता है। इसे भक्ति कहते हैं।
     1.भक्ति होती कैसे है , इसे समझें
सर्वप्रथम  इष्ट चर्चा में ध्यान लगावें यानी इष्ट के बारे में सुनने  की आदत डालें। 
2. तत्पश्चात इष्ट के  नाम और चर्चा को आगे भी  बढ़ाएं यानी उनकी चर्चा आप लोगों से साझा करें। इससे इष्ट की समझ बढ़ती है और उसमें ध्यान केंद्रित होता है।
3. इष्ट चर्चा के साथ ही अपने कर्मों को ईष्ट के प्रति समर्पित होकर करें यानी कर्म करने का भाव कर्मयोग का हो। इस भाव से जब व्यक्ति कर्म करता है तो जो भी करता है उसे इष्ट के प्रति समर्पित होकर करता है।
4.कर्म तो इष्ट को समर्पित होकर करें ही, जो कर्मों के फल हैं उन्हें भी इष्ट को समर्पित कर दें, उन कर्मों को और कर्मफलों को अपना समझने की भूल न करें बल्कि ये समझें कि ये सभी तो इष्ट के ही हैं।यही सच्ची पूजा है।
5. अपने सभी कर्मों में, भावों में इष्ट को खुद से ऊँचा स्थान देते हुए उनके प्रति विनीत रहें। कोई अहंकार न हो, कोई ईगो न रह जाये इष्ट के समक्ष आपके मन बुद्धि में।
6. जब इष्ट के प्रति सब कुछ समर्पित कर देंगे तो इष्ट के समक्ष खुद को उसके सेवक भाव में पाएंगे। यही समर्पण जिसमें अपना कुछ भी न रह जाये, ईगो तक नहीं, प्राण तक नहीं वही भक्ति की तरफ ले जाता है।
7.यह अनुभव करें कि इष्ट कोई दुसरा नहीं वह तो आपका सखा है, वह तो वो है जिससे आपका नेह का बंधन है , जिससे आप सब कुछ साझा करते हैं और जो आपका सबसे प्रिय है।
8. और अंत में इष्ट से आपका जुड़ाव ऐसा हो जाता है कि इष्ट आपमें नहीं आप इष्ट में समाहित हो जाते हैं।
   भक्ति के चरम पर आप अपनी स्थिति खोकर इष्ट में घुल मिल जाते हैं। तब आप आप नहीं आप हीं इष्ट हो जाते हैं ।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 23

अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में श्रीकृष्ण अर्जुन को मरणोंपरान्त प्राप्त होने वाली स्थिति से अवगत कराते हैं जो जीवन काल में किये गए कर्मों पर निर्भर करता है। बहुतों को पुनर्जन्म में विश्वास नहीं हो सकता है किंतु श्रीकृष्ण के कथ्य से स्पष्ट है कि जो कुछ आप जीवन काल में करते हैं वही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जीवनकाल में किये गए कर्म ही आपके अर्जित संस्कार हैं। सो हर व्यक्ति जो कुछ अपने जीवन में करता है उसी का फल उसे प्राप्त होता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने जीवन के महत्व और उस जीवन में किये गए कर्मों के महत्व को रेखांकित किया है। सो जीवन में जो हम कर्म करते हैं वही हमारे मोक्ष के आधार बनते हैं। इनका क्या परिणाम निकलता है सो वे समझाते हैं। इस शिक्षा को समझने से जीवन काल में व्यक्ति को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है जिससे उसका और समस्त संसार का कल्याण होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 24, 25, 26, 27 एवम 28

कर्मबन्धन से मुक्ति ही जीवन मरण के चक्र से मुक्ति है। यदि आसान और सामान्य भाषा में इस मुक्ति के मार्ग को समझने की कोशिश की जाए तो इसका बहुत सरल अर्थ है कि जब व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण चेतना को विश्वव्यापी अनंत चेतना के साथ जोड़ लेता है और सत्यान्वेषण में लग जाता है तब उसके कर्म निश्चित ही अपने जीवनकाल में ही दैवी गुणों को जीता हुआ, उन्हीं के मार्ग पर चलता हुआ शरीर त्याग करता है। सो शरीर त्याग के बाद भी उसकी यात्रा उसी मार्ग पर जारी रहती है। इस मार्ग में फलों की इक्षा से मुक्त व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त होता है सो उसके पास कुछ भी अप्राप्य फल शेष नहीं होते हैं और वह इस कारण जीवन मरण के चक्र से मुक्त होता है। इस तरह का व्यक्ति अपने दैवी गुणों के कारण जो कुछ कर्म  करता और चिंतन चिंतन करता हुआ शरीर त्याग करता है उनमें परम् तत्व परमात्मा का ही वास बना रहता है सो मृत्यु पर्यन्त भी वह उसी परमात्मा में विलीन होकर पुनः किसी जन्म को धारण करने से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार मृत्यु के उपरांत की स्थिति जीवनकाल सदकर्मों पर निर्भर करती है। सो हमें चाहिए कि अपने जीवन काल में हम उसी मार्ग का अनुसरण करें जो दैवी गुणों से परिपूर्ण है अर्थात जिसमें मोह और भ्रम नहीं है, जो सत्य के अन्वेषण की तरफ ले जाता है, जिसमें आलस्य, क्रोध, लोभ, लालच, अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या आदि नहीं है। यही मार्ग उत्तरायण मार्ग है और विद्या जो प्रकाश का प्रतीक है उससे भी परिपूर्ण है। इस मार्ग को ज्ञान का प्रकाश दिन और रात हमेशा ही प्रकाशित करते रहता है और जीवन का  यह मार्ग व्यक्ति को उसके परम् यानी ब्रह्म से मिलाता है।
   इसके विपरीत जो मार्ग है उस मार्ग से चलने पर मृत्यु के उपरांत भी जीवन चक्र से मुक्ति नहीं मिल पाती है। वह मार्ग अंधकार का है और लिप्सा से उतपन्न बन्धन व्यक्ति को उन अतृप्त लिप्साओं के लिए फिर से जीवन चक्र में ,धकेल देता है। यदि आराधना में कमी रह जाती है तो की गई आराधना अथवा किये गए अनुचित कर्मों से संचित संस्कारों के अनुसार मृत्यु के उपरांत भी मुक्ति नहीं मिल पाती है और व्यक्ति इन संचित संस्कारों के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त कर इनके फलों को भोगता है।
        मृत्यु के उपरांत के इन दो मार्गों को जान समझ लेने वाला व्यक्ति पहले मार्ग की महत्ता को समझ कर कर्मयोग का आचरण करता हुआ यदि योगी का जीवन जीता है तो वह उन सभी से श्रेष्ठ है जो कई तरह के कर्मकांड आदि करते हैं। और अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है। सो हमें चाहिए कि जीवन काल का महत्व समझें और इसका सदुपयोग करते हुए दैवी गुणों से परिपूर्ण जीवन कर्मयोग के अनुसार जियें ताकि मृत्यु के उपरांत इस जीवन चक्र से मुक्त हो सकें।

ॐ तत्सदिति श्री मद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः। ।।8।।



    

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