श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 24, 25, 26, 27 एवम 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 24, 25, 26, 27 एवम 28

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥ ।।24।।

जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ।।24।।

धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ ।।25।।

जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है। ।।25।।

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः॥ ।।26।।

क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के अनुसार अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)-- जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ ( अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है। ।।26।।


नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥ ।।27।।

हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो। ।।27।।

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌॥ ।।28।।

योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है। ।।28।।

ॐ तत्सदिति श्री मद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे अक्षर ब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः। ।।8।।


कर्मबन्धन से मुक्ति ही जीवन मरण के चक्र से मुक्ति है। यदि आसान और सामान्य भाषा में इस मुक्ति के मार्ग को समझने की कोशिश की जाए तो इसका बहुत सरल अर्थ है कि जब व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण चेतना को विश्वव्यापी अनंत चेतना के साथ जोड़ लेता है और सत्यान्वेषण में लग जाता है तब उसके कर्म निश्चित ही अपने जीवनकाल में ही दैवी गुणों को जीता हुआ, उन्हीं के मार्ग पर चलता हुआ शरीर त्याग करता है। सो शरीर त्याग के बाद भी उसकी यात्रा उसी मार्ग पर जारी रहती है। इस मार्ग में फलों की इक्षा से मुक्त व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त होता है सो उसके पास कुछ भी अप्राप्य फल शेष नहीं होते हैं और वह इस कारण जीवन मरण के चक्र से मुक्त होता है। इस तरह का व्यक्ति अपने दैवी गुणों के कारण जो कुछ कर्म  करता और चिंतन चिंतन करता हुआ शरीर त्याग करता है उनमें परम् तत्व परमात्मा का ही वास बना रहता है सो मृत्यु पर्यन्त भी वह उसी परमात्मा में विलीन होकर पुनः किसी जन्म को धारण करने से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार मृत्यु के उपरांत की स्थिति जीवनकाल सदकर्मों पर निर्भर करती है। सो हमें चाहिए कि अपने जीवन काल में हम उसी मार्ग का अनुसरण करें जो दैवी गुणों से परिपूर्ण है अर्थात जिसमें मोह और भ्रम नहीं है, जो सत्य के अन्वेषण की तरफ ले जाता है, जिसमें आलस्य, क्रोध, लोभ, लालच, अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या आदि नहीं है। यही मार्ग उत्तरायण मार्ग है और विद्या जो प्रकाश का प्रतीक है उससे भी परिपूर्ण है। इस मार्ग को ज्ञान का प्रकाश दिन और रात हमेशा ही प्रकाशित करते रहता है और जीवन का  यह मार्ग व्यक्ति को उसके परम् यानी ब्रह्म से मिलाता है।
   इसके विपरीत जो मार्ग है उस मार्ग से चलने पर मृत्यु के उपरांत भी जीवन चक्र से मुक्ति नहीं मिल पाती है। वह मार्ग अंधकार का है और लिप्सा से उतपन्न बन्धन व्यक्ति को उन अतृप्त लिप्साओं के लिए फिर से जीवन चक्र में ,धकेल देता है। यदि आराधना में कमी रह जाती है तो की गई आराधना अथवा किये गए अनुचित कर्मों से संचित संस्कारों के अनुसार मृत्यु के उपरांत भी मुक्ति नहीं मिल पाती है और व्यक्ति इन संचित संस्कारों के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त कर इनके फलों को भोगता है।
        मृत्यु के उपरांत के इन दो मार्गों को जान समझ लेने वाला व्यक्ति पहले मार्ग की महत्ता को समझ कर कर्मयोग का आचरण करता हुआ यदि योगी का जीवन जीता है तो वह उन सभी से श्रेष्ठ है जो कई तरह के कर्मकांड आदि करते हैं। और अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है। सो हमें चाहिए कि जीवन काल का महत्व समझें और इसका सदुपयोग करते हुए दैवी गुणों से परिपूर्ण जीवन कर्मयोग के अनुसार जियें ताकि मृत्यु के उपरांत इस जीवन चक्र से मुक्त हो सकें।

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