श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 22

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌॥ ।।22।।

हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है  सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य  से ही प्राप्त होने योग्य है। ।।22।।

ईश्वरीय स्थिति प्राप्त करने के सम्बंध में पूर्व में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और ज्ञानयोग के मार्ग को समझाया है। अब उसी को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण भक्तियोग के मार्ग को समझाते हैं। 
      ईश्वरीय स्थिति ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति से मिलती है यानी बिना किसी शकोसुभहा के जब व्यक्ति ईश्वर ले प्रति श्रद्धा से समर्पित होता है तो उसे वही ईश्वरीय पद प्राप्त होता है जिस ईश्वर की वह आराधना करता है। किसी भी स्थिति में अभीष्ट को प्राप्त करने का यही निष्ठायुक्त श्रद्धा का मार्ग होता है। इसे भक्ति कहते हैं।
     1.भक्ति होती कैसे है , इसे समझें
सर्वप्रथम  इष्ट चर्चा में ध्यान लगावें यानी इष्ट के बारे में सुनने  की आदत डालें। 
2. तत्पश्चात इष्ट के  नाम और चर्चा को आगे भी  बढ़ाएं यानी उनकी चर्चा आप लोगों से साझा करें। इससे इष्ट की समझ बढ़ती है और उसमें ध्यान केंद्रित होता है।
3. इष्ट चर्चा के साथ ही अपने कर्मों को ईष्ट के प्रति समर्पित होकर करें यानी कर्म करने का भाव कर्मयोग का हो। इस भाव से जब व्यक्ति कर्म करता है तो जो भी करता है उसे इष्ट के प्रति समर्पित होकर करता है।
4.कर्म तो इष्ट को समर्पित होकर करें ही, जो कर्मों के फल हैं उन्हें भी इष्ट को समर्पित कर दें, उन कर्मों को और कर्मफलों को अपना समझने की भूल न करें बल्कि ये समझें कि ये सभी तो इष्ट के ही हैं।यही सच्ची पूजा है।
5. अपने सभी कर्मों में, भावों में इष्ट को खुद से ऊँचा स्थान देते हुए उनके प्रति विनीत रहें। कोई अहंकार न हो, कोई ईगो न रह जाये इष्ट के समक्ष आपके मन बुद्धि में।
6. जब इष्ट के प्रति सब कुछ समर्पित कर देंगे तो इष्ट के समक्ष खुद को उसके सेवक भाव में पाएंगे। यही समर्पण जिसमें अपना कुछ भी न रह जाये, ईगो तक नहीं, प्राण तक नहीं वही भक्ति की तरफ ले जाता है।
7.यह अनुभव करें कि इष्ट कोई दुसरा नहीं वह तो आपका सखा है, वह तो वो है जिससे आपका नेह का बंधन है , जिससे आप सब कुछ साझा करते हैं और जो आपका सबसे प्रिय है।
8. और अंत में इष्ट से आपका जुड़ाव ऐसा हो जाता है कि इष्ट आपमें नहीं आप इष्ट में समाहित हो जाते हैं।
   भक्ति के चरम पर आप अपनी स्थिति खोकर इष्ट में घुल मिल जाते हैं। तब आप आप नहीं आप हीं इष्ट हो जाते हैं 

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