श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 19

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ ।।19।।

हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है। ।।19।।

जीवन की निरंतरता हमेशा बनी रहती है। जीवन का मूल स्वरूप एक ही है और वही जीवन भिन्न भिन्न आकार-प्रकार में विद्यमान होते रहता है। इस प्रकार जीवन चक्रिक है, जन्म और मृत्यु उसके दो पड़ाव अवश्य हैं किंतु वे न तो प्रारम्भ हैं और न अंत। वे जीवन की निरंतरता में दो पड़ाव मात्र हैं।

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