श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 परिचय

 श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7              
परिचय

अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझाया है कि कैसे हम अपने को पहचान पाते हैं, कैसे हम समझ पाते हैं कि हम मात्र शरीर, मन और बुद्धि नही हैं, बल्कि उनसे भी आगे हम वास्तविक रुप से आत्म स्वरुप आत्मा हैं जो सभी में एकमान है और जो सम्पूर्ण विस्तार का ही एक रूप है। इस तरह श्री कृष्ण ने हमें समझाया है कि अपने वास्तविक रूप में हम सब एक हैं और हम सब परम आत्मा के ही स्वरूप हैं। हम कोई अलग इकाई नहीं बल्कि सम्पूर्णता के ही एक प्रतिरूप हैं। अपने स्व यानी सेल्फ को , अपनी आत्मा को हम कैसे पहचाने, तो इसके लिए श्रीकृष्ण ने योग का मार्ग समझाया है जिसमें व्यक्ति अपने गुणों के स्तर में उत्तरोत्तर वृद्धि करता हुआ गुणातीत होकर ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है और इसके लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग के मार्ग बताएं हैं। लेकिन इतना सब कर लेने के बाद भी ये कतई आवश्यक नहीं है कि हम खुद के अंदर के ईश्वरत्व को पहचान सकें । ईश्वरत्व की ये विभूतियाँ ही वो सम्पदा हैं जो हमें अहसास दिलाती हैं कि हम मूल रूप से ईश्वर से अलग हैं ही नहीं। लेकिन इसे हम समझें तो कैसे समझे? क्योंकि इसे समझे बिना तो ईश्वरत्व की विभूतियों का मोल ही नहीं समझ सकते।  सो इस सत्य को समझाने और मनुष्य के ईश्वरत्व को जागृत करने के लिए श्रीकृष्ण भक्ति योग का मार्ग समझाने की शुरुआत कर रहें हैं। भक्ति का अर्थ है आराध्य के साथ एकीकरण और यह एकीकरण तभी सम्भव है जब भक्त और आराध्य समान गुणधर्म के हो जाएं।  तो आईये हम समझें कि कैसे ईश्वरत्व को समझने के लिए उन विभूतियों  के प्रति हम अनुरागी हो जाएं।

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