5.विष्णुसहस्रनाम-5-भूतकृत

5. विष्णुसहस्रनाम-5-भूतकृत

इस स्वरूप में विष्णु यानी यानी ईश्वर जगत के निर्माता हैं। रजो गुण की सहायता से ईश्वर व्हतीं यानी प्राणियों को रचता है। गुण तीन प्रकार के होते हैं। जब ईश्वर इनमें से एक रजोगुण को लेकर रचना की क्रिया करता है तो उसे भूतकृत कहते हैं।यानी ईश्वर वो है जो रचता है, जो प्राणियों के होने का कारण होता है।
      मनुष्य के अंदर में भी तीनों गुण होते हैं, यानी तमो, रजो और सत्व गुण। तमो गुण की अधिकता विनाश का कारण बनती है लेकिन रजो गुण की अधिकता से व्यक्ति रचना के पथ पर अग्रसर होता है। ईश्वरत्व की प्राप्ति के मार्ग पर योगक्रिया करता मनुष्य जब अग्रसर होता है तो कर्मयोग के मार्ग पर उसका क्रमिक विकास होता है। इसी क्रम में उसमें गुणों की अवस्था में उत्तोरोत्तर विकास होता है जब रजो गुण तमोगुण से अधिक होते हैं और धीरे धीरे वह तमोगुण को काटता हुआ रजोगुण को प्राप्त करता है तो उसके अंदर का रचनाकार भारी पड़ने लगता है। वह निर्माण की तरफ अग्रसर होता है। मनुष्य की इसी क्षमता को विष्णु द्वारा अपने रचियता स्वरूप में दिखलाया जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय