4. विष्णुसहस्रनाम -4-भूतभव्य भवतप्रभु
विष्णुसहस्रनाम -4-भूतभव्य भवतप्रभु
विष्णु यानी ईश्वर प्राणियों के अतीत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी होते हैं। हम सभी अपने कर्मों के नियन्ता होते हैं और उनके परिणामों के भागी भी होते हैं। हमारे अतीत, भविष्य और वर्तमान का निर्माण भी हमारे कर्मों के परिणाम में ही होते हैं। जीवन में हमारे पास अच्छे और बुरे दोनों तरह के कर्मों को करने के विकल्प होते हैं। जब हम सद्गुणों के अधीन होकर कर्म करते हैं तो हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य का निर्माण भी उन्हीं के अनुरूप होता है और यदि हम दुर्गुणों का मार्ग पकड़ते हैं तो फिर हमारे जीवन के हर काल में ही उनका परिणाम परिलक्षित होता है। सद्कर्मों को कर्मयोग के मार्ग से यज्ञ भाव से करता व्यक्ति ज्ञानयोग /भक्ति योग/ध्यानयोग की यात्रा करता हुआ मोक्ष को प्राप्त होता है और इस मोक्ष की अवस्था में जीवात्मा का अस्तित्व परमात्मा में विलीन होकर स्थान और काल से परे हो जाता है।
विष्णु हमारे सद्कर्मों में , हमारे योग कर्मों और योगाभ्यास में निवास करते हैं। यदि हम इनको अपने कर्मों के लक्ष्य के रूप में नहीं रख पाते तो हमारे अतीत, भविष्य और वर्तमान का स्वरूप बदरंग हो जाता है, किन्तु यदि हम इनको ही अपना ध्य्य बनाकर चलते हैं तो फिर हमारा हर काल इनको समर्पित होता हुआ अंततः हमें जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त कर कालातीत कर देता है।
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