श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 40

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याउ 6 श्लोक 40

श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ 40।।

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। ।।40।।
      योग के मार्ग के पथिक को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि योग का मार्ग कभी निरर्थक नहीं जाता, इस मार्ग में हर घड़ी एक मंजिल मिलती ही है जिसे कृष्ण ने अर्जुन के संशय को दूर करते हुए समझाया है। जब कोई व्यक्ति कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है तो वह व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता हुआ आगे बढ़ता है। इस रास्ते में हो सकता है कि व्यक्ति को कई दुरूह स्थितितियों का सामना करना पड़े। हो सकता है कि उसे अवसाद हो, दुख हो, पीड़ा पहुँचे। लेकिन ध्यान रहे कि उसका आचरण यदि कर्मयोग का बना हुआ है तो फिर उसका पतन नहीं हो पाता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व में परिमार्जन किसी बाहरी तत्व पर निर्भर नहीं होता है क्योंकि वह व्यक्ति तो आत्मशोधन करता हुआ चल रहा है। मान लीजिए कि आप किसी पहाड़ी क्षेत्र में जा रहें हैं तो कई बार ऊपर जाने के बाद आप फिर नीचे की तरफ जाते हैं तो इसका ये कतई तात्पर्य नहीं कि आप आगे ऊपर नहीं जा रहें हैं बल्कि सत्य तो ये है कि आपके आगे का मार्ग फिर ऊँचाई की तरफ का है। इसी प्रकार योग के मार्ग में यदि कोई कष्ट , परेशानी, आदि आता है तो इसका तात्पर्य मात्र इतना ही है कि आगे आपके व्यक्तित्व में और ऊँचाई आने वाली है क्योंकि योग मार्ग का पथिक अपने प्रगति के लिए किन्ही बाहरी तत्वों पर निर्भर होता ही नहीं है। योगाचरण में रत व्यक्ति के अंदर जो सद्गुण होते हैं वे उसे बराबर एक नई ऊँचाई प्रदान करते हैं सो इस व्यक्ति की अवस्था कभी खराब हो ही नहीं सकती है।

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