श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 37, 38, 39

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 38

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ 37।।

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥ 38।।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥ 39।।

अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है। ।।37।।

हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? ।।38।।

हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है। ।।39।।

अब एक प्रश्न उठता है कि व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ध्यान की तरफ अग्रसर है कि इसी बीच किसी कारणवश अपने उद्देश्य से भटक जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है तो इसका उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। हम ऐसे भी लोगों को देखते हैं जो जीवन की यात्रा तो सही ढंग से शुरू करते हैं किंतु जीवन के किसी मोड़ पर पहुंच कर पथभ्रष्ट हो जाते हैं तो ऐसे लोगों का क्या होता है? अर्जुन के मन में भी यही जानने की उत्कंठा है। दरअसल अर्जुन छात्र की भूमिका में आ चुका है जिसके मन में एक जिज्ञासु की भाँति हर तरह के प्रश्न उठ रहे हैं और यह तभी होता है जब व्यक्ति  की ज्ञान पिपासा बढ़ती है। खुलकर सवाल करना और जो उत्तरदायी व्यक्ति है उसका खुलकर तथ्यों को समझाना , यही वह परम्परा है जिससे समाज सही मार्ग पर बढ़ पाता है। जिस समाज में व्यक्ति प्रश नहीं करता, वह समाज  अंधभक्त होकर रूढ़िवादी और एकाधिकारवादी हो जाता है और परिणामतः गति खोकर अंततः पतनोन्मुखी हो जाता है। उसी प्रकार जब उत्तरदायी व्यक्ति प्रश्नों का उत्तर न देकर अपनी बात मनवाने की जिद्द पर उतर आता है तो फिर समाज रूढ़िवादी, आततायी, एकाधिकारवादी और अंततः पतनोन्मुखी हो जाता है। लेकिन श्रीकृष्ण समाज को उसके हर प्रश्न का उत्तर देते नजर आते हैं ताकि धर्म आधारित एक स्वस्थ समाज विकसित हो सके।

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