श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 35
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 35
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ 35।।
श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है। ।।35।।
अर्जुन का प्रश्न है कि मन तो बहुत चंचल, हठी, दृढ़ है तो फिर इसे कैसे नियंत्रित किया जाए ताकि योग की अवस्था प्राप्त की जा सके। इस प्रश्न पर श्रीकृष्ण का मत है कि प्रश्न तो सही है, ये समस्या तो है। किसी समस्या का समाधान तभी होता है जब हम समस्या की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। यदि हम माने ही नहीं कि समस्या है तो फिर समाधान कैसे खोजेंगे। समाधान खोजने का प्रथम चरण समस्या की उपस्थिति की सत्यता को स्वीकारना होता है और ये बात श्रीकृष्ण यँहा स्पष्ट कर देते हैं अर्जुन के कथन से सहमति व्यक्त कर के।
अब जब हम समस्या को पहचान चुके हैं तो इसके समाधान के क्या तरीके होंगे इसकी भी पहचान करनी होगी। इसके निम्न चरण होते हैं।
पहला तो ये है कि समाधान प्राप्त करने की अपनी क्षमता पर हमें भरोसा होना चाहिए। यदि समस्या पहचान कर हम समस्या से भागते हैं तो फिर तय है कि हमारे पास समाधान नहीं आने वाला है। सो श्रीकृष्ण अर्जुन को सबसे पहले तो यह याद दिलाते हैं कि तुम सामर्थवान हो इस समस्या का समाधान खोजने के लिए और इसके लिए वे अर्जुन को महाबाहु नाम से सम्बोधित करते हैं अर्थात जो भीषण योद्धा हो, जिसमें महान बल हो, लड़ने की अद्भुत क्षमता और महारथ हो वही तो महाबाहु हुआ। सो जब हमारा सामना समस्या से हो तो सबसे पहले हमें उस समस्या की उपस्थिति को स्वीकार कर उससे सामना करने और उसका समाधान पाने की अपनी क्षमता पर भरोसा करना आना चाहिए। विशालकाय हाथी को उसका पीलवान छोटे से अंकुश से साध लेता है, विशाल और बहुत तेज गति से दौड़ती ट्रेन को उसका चालक एक छोटे से ब्रेक से रोक लेता है। यानी हमें समस्या की विकरालता पर नहीं जाना चाहिए बल्कि अपनी क्षमता और अपने कौशल को देखना चाहिए जिसकी बदौलत हम समस्या का समाधान खोज सकते हैं। क्षमता के बाद यह कौशल ही वह दूसरा मार्ग है जिससे समस्या का समाधान आता है।
तो मन को नियंत्रित करने के कौशल कौन से हैं? पहला कौशल है निरन्तर अभ्यास। अभ्यास का मतलब होता है किसी एक कार्य विशेष को विशेष तरीके से बार बार दुहराना। ऐसा करने से उस विधि विशेष में हम पारंगत हो जाते हैं।
दूसरा है वैराग्य यानी असंगत होना अर्थात नॉन अटैचमेंट।
मन विचारों और आदतों का संग्रह होता है। प्रतेक व्यक्ति के मन में कुछ खास तरह के विचार ही बार बार आते हैं । उसी प्रकार कुछ खास तरह की आदतें होती हैं जिनको प्रतेक व्यक्ति विशेष बार बार दुहराता है। व्यक्ति विशेष के विचार और उसकी आदतें उसके परवरिश और उसके माहौल की उपज होते हैं।
जब मन को बाँधना है तो व्यक्ति के विचार और आदतें भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। इसके लिए जिन विचारों और आदतों का हम चयन करते हैं वे अचानक से हमारी नहीं हो जाती हैं, ऐसा नहीं कि किसी से सुना या कँही पढ़ा और तुरत अपना लिया। इसके लिए उन विचारों और आदतों को बारम्बार अपने व्यव्हार में दुहराते होना होता है , जिससे धीरे धीरे वे विचार और आदतें हमारे पुराने विचारों और आदतों जिनके कारण हम मन को बाँधने में खुद को असमर्थ पा रहे थे उनको हटा कर खुद को हमारे मन में स्थापित कर लेती हैं और तब हमारा व्यवहार और आचरण मन को बाँधने योग्य बन पाता है।
और ये अभ्यास एक विशेष प्रतिबद्धता यानी कन्विक्शन के साथ होनी चाहिए ताकि मन को भरोसा हो कि वह जो कर रहा है, जो सीख रहा है, जो अपना रहा है उसका एक विशेष उद्देश्य है। हमारी प्रतिबद्धता उन सांसारिक चीजों से दूर होती जाती है जिनसे मोह उतपन्न होता है , जो हमें क्षणिक सुखों से बाँधती हैं और हम धीरे धीरे उनसे दूर होते जाते हैं और हमारा मन अपनी आत्मा में रमता जाता है, हम अपने सद्गुणों को माँजने और उनको धार देने में रम जाने लगते हैं और धीरे धीरे उन चीजों से दूर होने लगते हैं जिनसे हम कुछ समय मात्र के लिए सुख या दुख मिला करता था। हमें लगने लगता है कि परम् सुख और समत्व की प्राप्ति के लिए हमें तो अपने सेल्फ की तरफ जाना है। हम सुख और दुख की अनुभूति के लिए अपने सेंसेस यानी इंद्रियों के वाह्य स्पंदनों पर निर्भर न कर अपने आंतरिक गुणों की तरफ मुड़ने लगते हैं। यह वैराग्य धीरे धीरे अभ्यास से आता है। सनद रहे कि यह वैराग्य संसार से घृणा करना नहीं है, बल्कि संसार से अपेक्षाओं का त्याग करना है, अपने सुख और दुख की अनुभूति अपने से बाहर के कारकों पर निर्भरता से मुक्ति है। संसार के साथ संव्यवहार करते हुए भी संसार के मोह से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन वैराग्य है। अपने पसन्द और नापसन्द से मुक्ति वैराग्य है।
और यह वैराग्य आता है विवेक से। यह विवेक सत्य और असत्य में भेद करना सिखाता है। सही और गलत में भेद करना सिखाता है। जब विवेक मन के अभ्यास में उतर आता है तो वैराग्य का रूप ले लेता है। दरअसल वैराग्य मन का ज्ञान है जिसे अभ्यास रूपी प्रशिक्षण से मन प्राप्त करता है। पहले जो मन दिन रात वासना पूर्ति में लगा रहता था वह विवेक और वैराग्य के ज्ञान के प्रशिक्षण से लोगों की भलाई में लग कर मन को सुख देने लगता है। वैराग्य आदत बन जाता है।
इन दोनों तकनीक यानी अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित किया जाता है। और ये दोनों जीवन के प्रत्येक चरण में सत्य हैं। सत्य, अहिंसा, सन्तोष, जैसे मूल्यों के निरन्तर अभ्यास से मन के ऊपर परे मोह से मुक्ति मिलती है। अति संक्षेप में समझें तो मोह(अटैचमेंट) से विरक्ति ही वैराग्य है। इन मूल्यों को जीवन के व्यवहार में उतारना ही अभ्यास है। ये तभी होता है जब इन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता होती है तभी मूल्य जीवन के अभ्यास में उतरता है। अन्यथा प्रतिबद्धता विहीन अभ्यास मात्र एक रूटीन होता है जिसका कोई फलाफल नहीं निकलता है और यह हमारे जीवन में हाइपोक्रेसी को यानी पाखण्ड को जन्म देता है।
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