श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 34
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ 34।।
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ। ।।34।।
योग की अवस्था को प्राप्त करने के लिए मन को स्थिर करना अनिवार्य है लेकिन अर्जुन मानता है कि मन को बाँधना लगभग असंभव है। यही हम सभी को भी लगता है क्योंकि
1.मन अति चंचल होता है, किसी एक स्थान, विषय पर टिकता नहीं है, एक से दूसरे पर भटकता रहता है। किसी भी एक चीज पर ध्यान केंद्रित होने की अवधि अत्यल्प होती है।
2.मन हमेशा उद्वेलित अवस्था में होता है, अतिशीघ्र उत्तेजित हो उठता है तो दूसरे ही पल इसकी दशा और दिशा दोनों बदल जाती है।
3.मन बलवान भी होता है जिधर लग जाता है उधर से हटने का नाम नहीं लेता है, बलात ध्यान भटकाने से भी मन भटकता नही है।
4.मन के अंदर एक दृढ़ता भी होती है जो उसके स्टैमिना को बढ़ाती है।
एके व्यक्ति का मन इतनी चीजों से एक साथ प्रभावित होते रहता है कि उसको एक दिशा और दशा में बनाये रखना उतना ही कठिन है जितना वायु के वेग को बाँधना, नियंत्रित करना। ऐसी स्थिति में योग और ध्यान कैसे हो,मन कैसे एकाग्र हो ये समझना जरूरी है अन्यथा योग और ध्यान सम्भव ही नहीं हैं।
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