श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 31
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है। ।।31।।
जब व्यक्ति कर्मयोग से परिपूर्ण होकर ज्ञान और ध्यान को अपना लेता है तब वह योगी अपना प्रसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में पाता है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने में पाता है। इसका तात्पर्य है कि एक योगी सभी में स्वयम की आत्मा का विस्तार देखता है और सभी की आत्मा को स्वयम में पाता है। अर्थात इस योगी के लिए भेद भाव का कोई स्थान नहीं होता है, बल्कि वह तो यह देख पाने में सक्षम हो जाता है कि वह और दूसरा कुछ भी भिन्न नहीं हैं, बल्कि वह तो वही है जो अन्य हैं और जो अन्य हैं वह वह है। यानी कि योगी अपने ही सेल्फ को सब में देख पाता है और समझ पाता है कि दूसरे का सेल्फ , दूसरे की आत्मा कुछ भी अलग नहीं है बल्कि सभी एक ही विस्तृत अस्तित्व के रूप भर हैं, कोई भेद भाव नहीं है।
इस स्थिति में यह योगी सभी चर-अचर की निरन्तर सेवा में लगा होता है। उसके लिए ईश्वर कुछ अन्य इकाई नहीं है बल्कि सभी उसी ईश्वर के रूप हैं और वह सभी की सेवा करता हुआ सभी से प्रेम करता हुआ ईश्वर को भजता है। परमात्मा की आराधना यही है कि परमात्मा के स्वरूप जो भिन्न भिन्न चर-अचर से अभिव्यक्त होते हैं उसके समक्ष उनकी सेवा करता हुआ आनंद प्राप्त करता है।
ऐसा योगी व्यक्ति जितने भी सांसारिक कार्य करता है उन कार्यों को करता हुआ भी उनके मूल में सभी के प्रति सेवा, प्रेम और समर्पण जैसे भाव होते हैं। उसके लिए कुछ भी और कोई भी उसके सेल्फ से, उसकी आत्मा से भिन्न नहीं है सो वह निरन्तर उन सभी में रमा परमात्मा में रमा होता है।
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