श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 28
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 28
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥ 28।।
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है। ।।28।।
जब व्यक्ति कर्मयोग के अनुसार क आचरण को करता हुआ अपनी आत्मा यानी सेल्फ पर अपना ध्यान केंद्रित और एकाग्रचित्त होकर रखता है यानी जिस अवस्था में व्यक्ति की चेतना से कामनाओं और इंद्रियों के आकर्षण समाप्त हो गए होते हैं और उसका ध्यान सभी अंदुरुनी इक्षाओं और बाहरी कारकों से मुक्त हो तब व्यक्ति की समस्त चेतना का प्रसार उसके अपने सेल्फ पर होता है। इस समय वह व्यक्ति अपनी ही सेल्फ की चेतना में समस्त अस्तित्व का विस्तार देखता है और उसे समस्त दृश्य और अदृश्य बह्मांड में अपना ही विस्तार महसूस होता है और समस्त ब्रह्मांडीय विस्तार को अपने अंदर पाता है। इस अवस्था में व्यक्ति के अंदर सभी चर-अचर से भेद भाव समाप्त हो जाता है और पूर्ण विस्तार में अपना अस्तित्व पाता है । इस समय व्यक्ति के पास सुख और आनंद के सिवा कुछ दुख और क्लेश शेष नहीं होता क्योंकि अन्य सभी कारक से तो उसकी मुक्ति हो मिल चुकी होती है। चूँकि यह सुख इंद्रियों की अनुभूति पर नहीं निर्भर करती सो इसका कोई अंत नहीं होता है।
सो हमें चाहिए कि हम अपने आचरण की शुचिता पर ध्यान दें, सेवा और समर्पण के साथ रहें, कामनाओं को कमतर करते करते उनसे मुक्त हों, इंद्रियों के प्रभाव को समाप्त करें और स्वयम पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
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