श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 27

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌॥27।।

क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है। ।।27।।

ध्यान कब करना चाहिए, ध्यान करने की अहर्ताएँ क्या हैं, ध्यान करने की आवश्यक विधि क्या है इन सब को समझने के पश्चात हम देखते हैं कि ध्यान करने से होता क्या है।
         जब व्यक्ति सारे बाहरी तत्वों और अंदुरुनी इक्षाओं से मुक्त होकर अपने सेल्फ पर टिक जाता है तो उस समय उसे ज्ञान हो पाता है कि वह मात्र शरीर नहीं है बल्कि शरीर से बहुत आगे सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय अस्तित्व का वह भी एक भाग है, वह स्वयम भी वही अस्तित्व है जिसे लोग परमात्मा कहते हैं। इक्षाओं और कामनाओं से मुक्त व्यक्ति की तमोगुण और रजोगुण से मुक्ति मिल चुकी होती है। और गुणों से मुक्त होते इंसान के अंदर मात्र और मात्र आनंद ही शेष रह जाता है।
    इसे अगर हम अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से समझना चाहें तो समझें कि कामनाओं का त्याग और इंद्रियों के विषयों से मुक्ति के बाद हमारे पास दो ही चीज रहते हैं, एक कि हम अपने शरीर की परिधि से निकल कर खुद को विस्तृत अस्तित्व का एक भाग के रूप में देख समझ पाते हैं, हमारा विस्तार शारीरिक सीमाओं के परे ब्रह्मांडीय हो जाता है और दूसरा इक्षा विहीन आनंद । ऐसी स्थिति होती है कि हमारे सुख का स्रोत हमारी इक्षाएँ नहीं होती बल्कि ये अनुभूति होती है कि हम शरीर नहीं हैं बल्कि उससे बहुत आगे हम स्वयम में पूर्णता के प्रतीक हैं। लेकिन इस अवस्था को पाने की विधि मात्र और कर्मयोग के मार्ग पर है जिसपर चलकर हम ध्यान यानी मैडिटेशन कर सकते हैं।

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