2. विष्णुसहस्रनाम-2 -विष्णु

2.विष्णु
      ईश्वर कौन हैं, जब हम इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं तो पाते हैं कि ईश्वर समय, स्थान और वस्तु से परे हमेशा और हर जगह हर मूर्त और अमूर्त में निवास कर रहें होते हैं। ईश्वर ही रचनाकार है और वही रचना में भी है। 
   वस्तुतः मनुष्य के सोच का दायरा भी तो समय, स्थान और वस्तु से परे है। इस सोच के दायरे में सब कुछ है, सम्पूर्ण अतीत है, सम्पूर्ण वर्तमान है और सम्पूर्ण भविष्य है। वह सब कुछ है जो हो सकता है। ईश्वर भी वही है , वह वह सबकुछ है जो सम्भव है और जो असम्भव है, जो सबमें है और सबसे बाहर भी है। काल, स्थान और वस्तु से न तो ईश्वर को परिभाषित किया जा सकता है न ही मनुष्य की सोच को। ये मनुष्य की सोच ही है जो उसे ईश्वर को पाने के लिए प्रेरित भी करती है और उसे पाकर भी खो देने के लिए भी प्रेरित करती है। 
      जब हम ये समझ पाते हैं कि सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य अस्तित्व का प्रसार हमारे अंदर है तब हम अपनी सम्भावनाओं को सम्भव की सीमा से भी आगे लेकर चले जाते हैं। हम मूर्त रूप से शरीर होते हुए भी अमूर्त रूप से हर दृश्य और अदृष्य में अपनी उपस्थिति अपने सोच के माध्यम से दर्ज करा देते हैं। यही समझ हमें समझाती है कि हम उसी रचना के अंश हैं जो हर जगह हर समय हर वस्तु में विद्यमान होती है। हमारी यह अनुभूति ही हमें विष्णु होने का भान देती है। हम ही विष्णु हैं, विष्णु ही हम हैं। न हम ईश्वर से विलग हैं और न ईश्वर हमसे विलग है। यह सत्य इस पर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की सर्वव्यापकता को अपने अंदर कितना ढूँढ पाते हैं।यदि हम इस सत्य को अपने अंदर से खोजकर अपने कॉन्सियसनेस का सजग भाग बना लेते हैं तो हम  विष्णु होने की अनुभूति को महसूस कर सकते हैं। विष्णु की सर्व्यापकता हमारे सेल्फ के विस्तार से ही हमें समझ में आ पाती है। इस सत्य को जो खोज पाता है वही विष्णु होता है।

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