श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय में ध्यान यानी मैडिटेशन की चर्चा है। लेकिन इस अवस्था तक पहुंचने के पूर्व हमें अपनी आध्यात्मिक  यात्रा के कई चरण पूरे करने होते हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवद्गीता के पहले अध्याय से पाँचवे अध्याय तक में क्रमानुसार किया गया है। जब मोह में बढ़ोतरी होती है तो भ्रम भी बढ़ता है और भ्रम के कारण अवसाद और दुख भी बढ़ता है क्योंकि तब विवेक अक्षम हो जाता है निर्णय लेने में। इस अवस्था में मानसिक क्लेश काफी होता है। तब इससे बाहर निकलने के लिए ज्ञान की आवश्यकता महसूस होती है और यह बेचैनी हमें उस ज्ञान की तरफ ले जाती है जँहा हम ये जान पाते हैं कि इस भ्रम और मोह और इनसे उपजे क्लेश से छुटकारा पाने का एक मात्र तरीका है कि हम खुद की खोज पूरी करें, हम जान सकें कि हम कौन हैं और यही खोज हमें हमारे सेल्फ यानी आत्मा तक ले जाता है। जब हम खुद को जान लेते हैं तो हम स्थितप्रज्ञ हो जाते हैं। किंतु यह ज्ञान मिलता कैसे है? तो इस ज्ञान को हम मात्र पोथी बाँच कर नहीं पा सकते हैं, बल्कि निष्काम भाव से कर्म कर ही हम समझ पाते हैं कि हमारे वास्तविक अस्तित्व का अर्थ क्या है। इस समय जब हमारे कर्म किसी उच्च आदर्श को समर्पित होते हैं और जब हम अपने कर्म के लिए किसी फल विशेष की इक्षा को नहीं पालते बल्कि उस उच्च आदर्श को समर्पित होकर कर्म करते हैं तो हमारे अंदर से "मैं कर्ता हूँ" का अहंकार मिटता है और हमारा विवेक जागृत होता है। लेकिन हमें भ्रम बना रहता है। ज्ञान की समझ तो आने लगती है लेकिन मन की स्थिरता पूरी नहीं होती है सो फल से पूर्ण वैराग्य नहीं होता है । तब आवश्यकता होती है कि हम एकाग्र होकर  चिंतन में लगे अर्थात ध्यान में लगे ताकि हमारे अंदर के अहंकार का समापन हो सके और हम समझ सकें , आत्मसात  कर सकें खुद को उस विस्तृत सत्ता के साथ जिसके हम अंश हैं। अध्याय 6 हमें इसी ध्यान के मार्ग पर प्रशस्त करता है।

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