श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 26
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥
काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है। ।।26।।
जिस व्यक्ति ने कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ज्ञान प्राप्त किया है, उस व्यक्ति के मन में बाह्य माध्यमों से सुख प्राप्ति की कोई लालसा नहीं रह जाती क्योंकि उसे पता है कि यदि इस तरह की कोई कामना रहेगी मन में तो कामना पूर्ति के बाद भी और कामनाएँ जन्म लेंगी अर्थात उसके मन में लोभ उतपन्न होगा और बार बार कामनाओं की पूर्ति के प्रयास में लगे रहने से उसका ध्यान भी बार बार भंग होगा और कामनाओं का कोई अंत भी नहीं होगा। इसी प्रकार वह ये तथ्य भी जानता है कि यदि कामनाओं की पूर्ति में कोई बाधा आएगी तो फिर ईर्ष्या और क्रोध होगा। सो ज्ञानी व्यक्ति खुद को कामनाओं से मुक्त करता है। काममुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ और मन हमेशा संयत होते हैं , उनमें किसी प्रकार की उत्तेजना नहीं होती , वे सुख प्राप्ति के लिए बाहरी माध्यमों की तरफ नहीं भागते हैं बल्कि खुद की तरफ आते हैं, खुद के सेल्फ में स्थिर होते हैं। इस तरह से काम मुक्त इंसान के लिए परमात्मा कोई दूर लोक में बसने वाले नहीं होते बल्कि परमात्मा तो स्वयम उसका सेल्फ यानी उसकी आत्मा ही होती है। जब आप कामना, अपेक्षा , फल, जैसी भावना से मुक्त होकर मन शरीर और विवेक से स्वतः क्रियाशील रहते हैं तो हमेशा दूसरों के हितार्थ कर्म करते हैं, जिसे सेवा कहते हैं। यह सेवा भाव आपको असीम शांति देता है जिससे अक्षय सुख की प्राप्ति होती है। यही अक्षय सुख जो खुद आपके ही अंदर से आ रहा होता है परमात्मा है, जिसमें आप स्थित होकर खुद के अहम से मुक्त हो गए होते हैं।
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