श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ।।25।।

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इस प्रकार ज्ञान प्राप्त व्यक्ति को ऋषि यानी सत्यद्रष्टा कहते हैं जिसने सत्य को जानकर ये अपनी अज्ञानता को दूर कर लिया है। ज्ञान के कारण उसे ये समझ मिल चुका होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप उसका भौतिक रूप नहीं बल्कि उसकी आत्मा यानी उसका सेल्फ है और इस अवस्था में उसके अंदर की सारी अशुद्धियाँ यानी पाप और सभी तरह के संशय समाप्त हो चुके होते हैं। संशय तभी दूर होता है जब ज्ञान की प्राप्ति हो पाती है। जैसे जैसे ज्ञान मिलता जाता है व्यक्ति का संशय दूर होते जाता है। अंततः सारे संशय दूर हो जाते हैं। ऐसा  व्यक्ति  सत्य को बिना किसी माध्यम के देख पाता है। इस अवस्था में ज्ञान संचालित होकर मन और इन्द्रियाँ पूर्णतः उस व्यक्ति के नियंत्रण में रहती हैं। चूँकि सारी लालसाओं का अंत कर ही ज्ञान मिल पाता है सो इन्द्रियों और मन को कोई वहज नहीं होता है कि वे इधर उधर भटकें। इस समय भी व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन उस इंसान के सारे कर्म दूसरों के हितार्थ ही होते हैं।  
       जब ज्ञान की इस अवस्था में व्यक्ति आ जाता है तब वह अपने सम्पूर्ण सांसारिक परिसर के साथ पूर्ण सामंजन में होता है, उसे कोई उद्वेग नहीं रह जाता है। इस शांत अवस्था में व्यक्ति शरीर होते हुए भी अपनी आत्मा से ही सब कुछ संचालित करते हुए आत्मा में स्थित होता है। व्यक्ति का सेल्फ व्यपाक सत्य का ही एक अंश है, इसे जान समझ कर , इस सत्य को ही जिता हुआ ज्ञान से परिपूर्ण इंसान खुद को परमात्मा में ही अवस्थित पाता है।

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