श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 23
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है। ।।23।।
8.
ज्ञानी व्यक्ति का अन्य लक्षण होता है कि वह कामनाओं और क्रोध के प्रभाव में नहीं आता। और यह क्षमता व्यक्ति को जीवित अवस्था में ही प्राप्त हो जाता है। इस समझदारी से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ज्ञान और मुक्ति का लक्ष्य जीवित रहते ही प्राप्त करना सम्भव है।
काम और क्रोध उसी तरह से व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करते हैं जैसे राग और द्वेष। जब व्यक्ति कामनाओं और क्रोध के प्रभाव में होता है तो वह उद्वेलित रहता है, उसकी नजर बराबर खुद के बाहर के कारकों पर टिकी रहती है। इस उद्वेगना में सम्भव नहीं है कि व्यक्ति चिरस्थाई सुख और शांति को पा सके। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह कामनाओं और कामना जनित क्रोध से खुद को मुक्त करे।
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