श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 22
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता। ।।22।।
7.
जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है न वह व्यक्ति इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के अभिलाषी नहीं होते हैं। उनको इस बात की समझ होती है कि इन्द्रियों से मिलने वाले सुख सुख नहीं बल्कि अंततः दुखों के ही कारण बनते हैं। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि जब व्यक्ति इन्द्रियों से मिलने वाले सुख में रमने लगता है तो उनसे उसे लगाव होने लगता है। तब यदि किसी कारणवश वे सुख कम होते हैं या छूटते हैं तो दुख होता है क्योंकि तबतक इन्द्रियों के सुख से लगाव हो चुका होता है। वस्तुतः ये सुख व्यक्ति के लिए उसका व्यसन बन चुके होते हैं, नशा का रूप ले चुके होते हैं जिनका मिलना और नहीं मिल पाना दोनों व्यक्ति के लिए घातक होता है। यदि वे सुख मिल रहे होते हैं तो व्यक्ति उसी को बचाने और बढ़ाने के फेरे में रहता है, वह उन्ही सुखों के लोभ में लगा रहा जाता है जिसके कारण दिन रात वह उन्हीं में लगा होता है, उसे खुद के अंदर देखने की फुर्सत नहीं होती। और यदि ये इन्द्रिय जनित सुख किसी कारण से छूटते हैं तो व्यक्ति उनको बचाने, उनको वापस पाने के लिए व्यकुल होने लगता है, उस अवस्था में उसे चिड़चिड़ाहट, गुस्सा, अवसाद, ईर्ष्या आदि होने लगते हैं। इस स्थिति में भी व्यक्ति को खुद के अंदर झाँकने, खुद को समझने की फुर्सत नहीं मिल पाता है। इस प्रकार दोनों ही स्थिति में व्यक्ति इन्द्रिय जनित सुखों के कारण उद्वेलित होकर गलत काम करने के लिए प्रेरित होता है। संसार के अधिकांश अपराधों की जड़ में व्यक्ति का अपनी इन्द्रियों के सुखों के लगाव ही होता है। ये सुख तो नश्वर होते हैं जो समय, काल, स्थान के सापेक्ष होते हैं। इन्हीं कारणों से वह व्यक्ति जिसे कर्मयोग के मार्ग पर चलने से ज्ञान मिल चुका होता है वह इन्द्रिय जनित सुखों के लोभ में नहीं रहता है।
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