श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 41 एवम 42

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 41 एवम 42

योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥
हे धनंजय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किए हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।
।।41।।

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का विवेकज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
।।42।।
इस प्रकार कर्मयोग की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सब को समझाते हैं कि कर्मयोग के माध्यम से कर्मयोग की शिक्षा का पालन करते हुए ज्ञानयोग की अवस्था पर पहुँचते हैं तो इस अवस्था में आत्मज्ञान होता है यानी हमें अपनी आत्मा का, अपने सेल्फ का अपने कौंसस्नेन्स का ज्ञान होता है, हमें ज्ञात होता है कि हम भी समग्र के प्रतिनिधि हैं। ऐसे आत्मवान व्यक्ति के कर्म कर्मों में विलय हो जाते हैं क्योंकि इस तरह से प्राप्त ज्ञान से इस बात का बोध हो चुका होता है कि हम कुछ नहीं करते, कर्म तो गुणों की अवस्था के अनुसार होते हैं और होते हुए अभीष्ट को समर्पित हो जाते हैं। व्यक्ति के रूप में हम करते हुए भी कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा हैं। ऐसे आत्मवान व्यक्ति के मन से सारे संशय, सारे भ्रम खत्म हो चुके होते हैं क्योंकि वह तो अपनी वास्तविक स्थिति जान चुका होता है। उसकी समस्त इन्द्रियाँ उसके सम्पूर्ण वश में होती हैं सो उसे कर्मफल से कोई मतलब नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्मों के बन्धन से मुक्त होता है।
इस अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी का आहवान करते हुए समझाते हुए कहते हैं कि कर्मयोग के मार्ग पर चलकर इस परम् ज्ञान को प्राप्त कर विवेक से अपने मोह और संशय से अपने अज्ञान का नाश कर कर्म करें। अर्जुन तू युद्ध कर यानी तुम कर्मयोग के माध्यम से अपने  नियत कर्म को करो।
      

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