श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 40

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 40

अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
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कर्मयोग और कर्मयोग के माध्यम से ज्ञान योग की प्राप्ति का तरीका बताने के पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जिस व्यक्ति में निम्न लक्षण होते हैं उसे कभी भी सुख की प्राप्ति नहीं पाती है-
1.विवेकहीन व्यक्ति
2.आश्रधायुक्त व्यक्ति
3.संशय युक्त व्यक्ति

विवेकहीनता 
विवेकहीन व्यक्ति का अपने कर्मों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ उच्छऋंखल होती हैं। ऐसा व्यक्ति अपने सेल्फ को देखने , समझने और पहचानने में असमर्थ होता है सो ऐसा व्यक्ति अपने कर्मों और उनके परिणाम के मोह में फंसा रह जाता है जिसके कारण उसकी इक्षाएँ और कामनाएँ कभी खत्म ही नहीं होती हैं। इस कारण से ऐसा व्यक्ति हमेशा ही दुखी रहता है और उसे इस संसार में रहकर भी, सभी साधनों के उपलब्ध रहते हुए भी सुख शांति की प्राप्ति नहीं होती है।

अश्रद्धा
    श्रद्धा  विश्वास  से ऑती है। यदि अपने कर्म पर, खुद पर, ज्ञान पर, ज्ञान देने वाले पर भरोसा ही नहीं होगा तो फिर उनके प्रति श्रद्धा कैसे होगी और जब श्रद्धा नहीं होगी तो फिर एकाग्रता और समर्पण भी नहीं सम्भव है। तब मन हमेशा चंचल रहेगा और इस कारण दुख कभी खत्म ही नहीं होगा। हमारी जैसी श्रद्धा होती है प्राप्ति भी उसी के अनुरूप होती है। यह तथ्य जीवन के हर भौतिक और आध्यात्मिक अंग पर लागू होता है।

संशय
    संशय मन को कभी एक जगह टिकने ही नहीं देता है। यह भ्रम उत्पन्न करते रहता है। विवेकहीन और आश्रधायुक्त व्यक्ति हमेशा संशय में ही जीता है जिसका परिणाम होता है उसे हमेशा अपने पर, और अपने बाहर और अपनी ही आत्मा पर कभी भरोसा नहीं हो पाता है, जिसका नतीजा होता है कि वह व्यक्ति नियमित ही भ्रम, मोह, माया में भटकते रह जाता है। तो फिर उसे शांति कँहा, सुख कँहा।

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