श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 39

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है। ।।39।।

इस ज्ञान को प्राप्त करने के तीन अनिवार्य शर्त हैं-
1.श्रद्धा
       हमारी जैसी श्रद्धा होती है बदले में हमें फल भी वैसा ही मिलता है। श्रद्धा का मतलब हम विश्वास से समझ सकते हैं। जब हम ज्ञान प्राप्त करने का उद्यम करना प्रारम्भ करते हैं तो ये आवश्यक है कि हम खुद पर, अपने शिक्षक पर और प्राप्त किये जाने वाले ज्ञान पर भरोसा रखें अन्यथा जो भी ज्ञान  हमें मिलता है उसे हम श्रद्धा के अभाव में पूर्णरूपेण नहीं ले पाते। यदि हमें खुद पर या शिक्षक पर या स्वयं ज्ञान पर ही अश्रद्धा होगी तो फिर ज्ञान प्राप्ति में हम एकाग्रचित्त होकर नहीं लग पाएंगे।

2. तत्परता
    दूसरी अनिवार्य शर्त है कि जिस ज्ञान को हम पाते हैं उसका तत्परता से अनुकरण करें। प्राप्त ज्ञान को समझना, उसका मनन चिंतन कर उसे आत्मसात कर उसका अनुकरण करने पर ही हम उस ज्ञान को खुद में समाहित कर पाते हैं।

3.जितेंद्रिय
     तीसरी शर्त है कि जब हम ज्ञान प्राप्ति के रास्ते चलें तो हमारे अपने इन्द्रियों पर और उनके बहिर्मुखी प्रवाह पर नियंत्रण होना चाहिए। शरीर, मन, मस्तिष्क और विवेक पूरी तरह से हमारे वश में होकर उन सभी का सामूहिक प्रयास ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए ताकि हम बिना भटके एकाग्रचित्त होकर ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर चल सके। यदि इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता है तो मन इधर उधर भागेगा और ज्ञान की प्राप्ति में एकाग्रचित्त होकर हम नहीं लग पाएंगे।
         उपरोक्त तरीको को आपना कर जब हम ज्ञान को प्राप्त करते हैं तो ज्ञान हमें परम् शांति की अनुभूति कराता है। ज्ञान ही वह निधि है जिसे पाकर हम किसी अन्य सुख की कामना भी नहीं करते और मन में शांति आती है। हमारे अंदर इक्षाओं और कामनाओं का , अहंकार का, माया और मोह का, सुख और दुख का जो कोलाहल मचा होता है उसका रहस्य ज्ञान प्राप्त कर जब पता चल जाता है तो फिर अंदर की उथल पुथल भी समाप्त हो जाती है और इसी अवस्था में मन शांत हो पाता है। यही अंतिम शांति भी है जो हमें जीते जी अपने ज्ञान से प्राप्त होती है जिसके कारण हम अपने अभीष्ट से जुड़ पाते हैं।

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