श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 37

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥

क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है। ।।37।।
ज्ञान प्राप्ति से होता क्या है? वस्तुतः कर्मयोग के रास्ते चलकर ज्ञान को प्राप्त करने से जो प्राप्त होता है वह है अपनी आत्मा, अपने सेल्फ , अपने स्व को पहचानना। इस ज्ञान की वजह से मोह, लोभ, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या जैसी आसुरी वृत्तियों का नाश होता है और व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त व्यक्ति समझ पाता है कि सब कुछ करते हुए भी वह कर्ता नहीं है, उसे तो बस अपना स्वधर्म निभाना है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम से विच्छेदित हो जाता है, उसे न कर्म से मोह होता है न उसे परिणाम से लगाव होता है, सो वह कर्म बन्धन में बँधता नहीं है। वह कर्म सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि (1) जीवित रहते हुए स्वधर्म के अनुसार उसके कुछ दायित्व हैं और (2) जो कर्मयोग के पथ में अभी पीछे हैं उनका मार्गदर्शन करना है। इस प्रकार कर्म और कर्मफल से मुक्त व्यक्ति के कर्म उस व्यक्ति को उसके जीवित अवस्था में भी उसे उन कर्मों से बांध नहीं पाते हैं।

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