श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 36

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 36

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा। ।।36।।

ध्यान देने वाली बात है कि ज्ञान से मुक्ति पाने का अधिकार किसी व्यक्ति विशेष या समूह विशेष के लिए सुरक्षित नहीं है। ऐसा नहीं है कि कोई खास तरह के लोग ही ज्ञान प्राप्ति के अधिकारी हैं। इतिहास बतलाता है कि मजबूत वर्ग के द्वारा कमजोड वर्ग के लोगों को ज्ञान से इस तर्क के आधार पर वंचित रखा गया था कि वे नीच हैं, पापी हैं । लेकिन श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस धारणा का पुरजोर खंडन किया है और बतलाया है कि नीच या पापी को भी ज्ञान प्राप्ति का सम्पूर्ण अधिकार है। वस्तुतः जो कोई भी कर्मयोग के क्रमिक मार्ग को अपनाता है अर्थात अपने स्वभाव को समझ कर कर्म के मार्ग में प्रवृत्त होता है , सेवा, दैवी सम्पद के संग्रहण , और इन्द्रियों का शमन करता है वह अगले कदम में ज्ञान का अधिकारी हो जाता है। वह इन प्रयासों से अपने मोह, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या आदि को समाप्त कर ज्ञान के मार्ग पर प्रशस्त होता है। चुँकि ज्ञान का अधिकार सभी को है सो ज्ञानप्राप्त कर चुके ज्ञानी जनों का  ये विशेष दायित्व बनता है कि जो इससे वंचित हैं उन्हें ज्ञान का कर्मयोग वाला मार्ग बताएँ, उसमें प्रशिक्षित करें
 इस एक शिक्षा से श्रीकृष्ण ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने का सार्वजनिक मार्ग खोल दिया है और उस प्रथा पर कड़ी चोट भी की है जिसके अनुसार ज्ञान प्राप्ति कुछ वर्ग का विशेषाधिकार बना दिया जाता है। इसका ये भी अर्थ है कि जब भी समझ आये , आँख खुले, व्यक्ति अपनी मुक्ति का प्रयास यानी कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ज्ञान प्राप्ति का प्रयास शुरू कर सकता है।

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