श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 35
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 35
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा।
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गुरु से प्राप्त इस ज्ञान से होता क्या है? इस पर श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब व्यक्ति सत्य के ज्ञानी गुरु से सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है,जब उसे तत्व का भान हो जाता है तब उसका मोह मिट जाता है। मोह भला कैसे जा सकता है? सामान्यतः व्यक्ति को तो यही लगता है कि जब तक देह है तब तक नेह लगा ही रहता है। ऐसा होता जरूर है लेकिन ये तब होता है जब व्यक्ति को सत्य का ज्ञान नहीं हो पाता। उसे लगता है कि उसने तो इतनी पुस्तकें पढ़ ली हैं , उसने तो इतनी डिग्रीयाँ हासिल कर ली हैं, उसने तो फलाना कॉलेज यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त कर ली है तो वह तो बहुत बड़ा ज्ञानी हो चुका है। यही तो भरम है। इस अवस्था में व्यक्ति जो कुछ सीखता है वो सब इस बाहरी संसार के सम्बंध में सीखता है, उसे खुद के तत्वों का ज्ञान कँहा मिलता है। ये सारे ज्ञान संसार में जीविकोपार्जन के लिए चाहे जितने कारगर हों उसे उसके सेल्फ से नहीं परिचित करा पाते हैं। लेकिन तत्वदर्शी सत्य ज्ञानी गुरु से प्राप्त ज्ञान उसे उसके सेल्फ से परिचित कराता है, वह जान पाता है कि उसका अपना अस्तित्व क्या है, उसका अपना स्व क्या है , वह खुद क्या है अपनी समस्त व्यवसायिक ज्ञान से परे।
जब व्यक्ति को गुरु से आत्मसाक्षात्कार का ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे अपनी आत्मा का दर्शन होता है और वह जान पाता है कि वही तो समस्त संसार भी है और समस्त संसार उसी के सेल्फ के अंदर भी है। उसका उसके सेल्फ के प्रति ज्ञान उसे मोह से मुक्त करता है। वह जान पाता है कि उसका भौतिक नश्वर स्वरूप उसके सेल्फ से भिन्न है जो अस्थाई है। स्थाई तो उसका अपना सेल्फ है, उसकी आत्मा है। उसका खुद के प्रति, अपने दायित्वों के प्रति, अपने कर्मों के प्रति मोह समाप्त होता है । उसे ज्ञात हो पाता है कि जिस तरह पानी की लहर और पानी दोनों एक ही है उसी तरह उसका भी वास्तविक अस्तित्व सम्पूर्णता से भिन्न नहीं है ।
जैसे जैसे व्यक्ति का मोह नष्ट होता है उसे वह दृष्टि प्राप्त होती जाती है जिससे वह सत्य की नजर से इस संसार को देख सके। किसी भी चीज को देखने भर से हमें उसकी जानकारी नहीं होती है, बल्कि जब हम किसी भी चीज को देखते हैं तो उसे हम उतना ही समझ पाते हैं जितना हमारे ज्ञान का स्तर होता है। जैसे यदि हमें अक्षर ज्ञान न हो तो कागज पर जो भी लिखा होता है उसका कोई अर्थ हमारे लिए नहीं होता वैसे ही सत्य का ज्ञान नहीं होने पर हम जो भी देखते हैं उसे अपने असत्य की दृष्टि से ही देख समझ पाते हैं। किसी भी चीज को देखने का हजार नजरिया हो सकता है लेकिन हर नजरिये से देखने पर हमें वी चीज आंशिक ही समझ में आ पाती है। लेकिन जब सत्य का ज्ञान होता है तो हम उस चीज को सत्य के नजरिये से देख पाते हैं और समझ पाते हैं कि उसके अस्तित्व का क्या अर्थ है, उसका अस्तित्व किस प्रकार एक व्यापक का एक प्रदर्शन मात्र है। तब व्यक्ति उस सम्पूर्ण व्यापक में स्वयम की अभिव्यक्ति को देख पाता है।
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