श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 33
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 33
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।
।।33।।
कर्मयोग के विभिन्न यज्ञकर्मों कोंसमझाने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन सभी यज्ञों में ज्ञान यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है, हमें अंततः उसी के शरण में जाना चाहिए। वस्तुतः कर्म योग एक यात्रा के समान होता है जो व्यक्ति के गुणों के अनुसार प्रारम्भ होता है और धीरे धीरे व्यक्ति निर्धारित कर्म के द्वारा उस स्थिति में पहुँचता है जब उसे अपने कर्मों से उस ज्ञान की प्राप्ति होती है कि वह स्वयं कौन है, वह समझ पाता है कि उसके द्वारा कर्म किये जाने के बावजूद भी कर्ता वो नहीं है बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप तो उसकी आत्मा है जो मात्र शरीर और मन मस्तिष्क को उनके गुणों की अवस्था के अनुसार कर्मों को करते देखती भर है। ये कर्म उस व्यक्ति के अंतिम लक्ष्य नहीं हैं बल्कि ये कर्म तो मात्र साधन भर हैं जिनके द्वारा व्यक्ति आने स्व को खोज पाता है।
सही तो यही है कि हम इस संसार में जो भी करते हैं वो सब इतना ही महत्व रखते हैं कि वे हमें ज्ञान की तरफ ले जाते हैं। श्रवण, मनन, चिंतन के द्वारा व्यक्ति अपने कर्मों के महत्व को समझ कर उनसे वो ज्ञान हासिल कर पाता है जिससे उसका उद्धार हो पाता है। सभी यज्ञ कर्मों का अंतिम लक्ष्य यही है सो ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन ये ज्ञान योग व्यक्ति की प्राम्भिक अवस्था नहीं होती है। श्रेष्ठ जनों की सेवा, यानी अपने लक्ष्य के प्रति सेवा भाव से समर्पित होकर, अपने हृदय में दैवी सम्पद को संग्रहित कर, अपने इंद्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमित कर जब व्यक्ति शरीर, मन-मस्तिष्क और विवेक से जो सही (जो पसन्द है वो नहीं) है उसके अनुसार कर्म में प्रवृत्त होता है , जब वह कर्मों के परिणाम से खुद को मुक्त कर कर्म का आचरण यज्ञ भावना यानी one for all और all for one की भावना से करता है तो उसे निश्चित ही वांछित ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान कर्म की अंतिम परिणति है।
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