श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 31, 32
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 31, 32
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥ ।।
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? ।।31।।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥
इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा। ।।32।।
इस प्रकार व्यक्ति को कर्म करने के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञकर्म बताकर श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि जब व्यक्ति यज्ञकर्म के परिणाम को अमृत समझकर बिना किसी खुशी या दुख के स्वीकार करता है वही व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव करता है। यज्ञकर्म शब्द से बार बार किसी कर्मकांड का भ्रम हो सकता है लेकिन यदि हम तृतीय अध्याय में दिए गए यज्ञ की व्यख्या को स्मरण में रखते हैं तो हमें इस तथ्य का भान रहता है कि यज्ञकर्म कर्म करने की एक विशिष्ट भावना होती है।
यदि व्यक्ति में यज्ञकर्म की भावना नहीं होती है व्यक्ति इस सन्सार में सब कर्म करते हुए भी अशांत और दुखी रहता है , जबकि यज्ञकर्म की भावना से कर्म करने वाला व्यक्ति यज्ञकर्म के परिणाम को प्रसाद मानकर ग्रहण कर प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस प्रकार का व्यक्ति जीवन में सुख के लिए किसी अन्य बाहरी कारक पर निर्भर नहीं करता है बल्कि उसे तो अपने कर्म में ही आनंद प्राप्त हो जाता है।
इस प्रकार के यज्ञकर्मों को करने से व्यक्ति कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। कर्मबन्धन क्या होता है? कर्मबन्धन से तात्पर्य है कि व्यक्ति सुख की तलाश में कर्म करता है और इस प्रकार कर्म के मोह में पड़ा रहा जाता है। लेकिन जब व्यक्ति मन , इन्द्रिय, शरीर से कर्म करता है और उस कर्म को करता है जो उसके स्वभाव के अनुसार होता है अर्थात स्वधर्म के अनुसार कर्म करता है और यह कर्म यज्ञकर्म की भावना से करता है तो उसे उस कर्म में ही आनंद की प्राप्ति हो जाती है, उसे कर्म के परिणाम पर प्रसन्नता के लिए निर्भर नहीं होना होता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्ति के उत्थान का एकमात्र मार्ग है यज्ञभावना से कर्म करना है। सभी साधना कर्म से पूर्ण होते हैं। इस तरह से कर्म करने से कर्म के प्रति कर्तापन का भाव नहीं आता और व्यक्ति ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।
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