श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 25
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥
दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। (परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना है।) ।।25।।
1.दैव यज्ञ
श्रीकृष्ण ने पूरी गीता में कर्मयोग के आचरण पर ही जोर दिया है और समझाया है कि कर्मयोग का आचरण कैसे करना है। कौन सा कर्म करना है इसे परिभाषित करते हुए समझाया है कि कि नियत कर्म करना है । नियत कर्म कौन सा है, इसे समझाते हुए कहा है कि नियत कर्म यज्ञ का कर्म है। अर्थात कर्मयोग में यज्ञकर्म करना है। यज्ञ कर्म क्या है , इसे हमने ऊपर देखा है तथा समझा है कि जब व्यक्ति यज्ञ कर्म के शिखर पर पहुँच जाता है तो उसके लिए सब कुछ ब्रह्म यानी आत्मस्वरूप हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मात्र दूसरों के लिए ही कर्म करता है।
लेकिन यह शिखर अचानक नहीं प्राप्त होता है, बल्कि क्रमिक सोपानों पर चढ़ते हुए व्यक्ति यज्ञ कर्म के शिखर तक पहुँचता है। तो शुरुआत कँहा से करें, इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण ने क्रमिक रूप से विभिन्न यज्ञ कर्मों को समझाया है।
जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलना प्रारंभ करता है तो सबसे पहले उसे दैव यज्ञ करना है। इस यज्ञ में व्यक्ति देवता की पूजा आराधना करना शुरू करता है। वस्तुतः देवता क्या है? देवता दैवी गुणों को व्यक्त करता स्वरूप मात्र है। अर्थात कर्मयोग के आचरण के प्रथम सोपान, दैव यज्ञ में व्यक्ति को श्रेष्ठजन के सानिध्य में रहकर उनके मार्गदर्शन में अपने भीतर दैवी सम्पद की वृद्धि करनी होती है। यही कर्मयोग की प्रारंभिक अवस्था है, प्रवेशिका है। इसी रास्ते चलकर यानी अपने अंदर दैवी सम्पद की वृद्धि कर व्यक्ति आत्मस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है यानी उसे अपने सेल्फ का ज्ञान होता है।
तत्पश्चात व्यक्ति दैवी सम्पद् की वृद्धि कर सदगुरू को ही उद्देश्य बनाकर उसका ध्यान करता है अर्थात व्यक्ति परम् लक्ष्य की तरफ बढ़ता है। इसका अर्थ ये समझें कि परम् को लक्ष्य बनाकर खुद के भीतर दैवी सम्पद की वृद्धि करने को ही दैव यज्ञ कहते हैं।
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