श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 26,27
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 26,27
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं। ।।26।।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 27
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानंदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना है।)
।।27।।
कर्मयोग के माध्यम से व्यक्ति के उत्थान हेतु यज्ञ कर्म के क्रमबद्धता को बनाये रखना अति आवश्यक होता है। प्रथम चरण में व्यक्ति को अपने अंदर दैवी सम्पद की बृद्धि करनी होती है तो आइए देखें द्वितीय चरण का यज्ञ कौन सा है।
2.संयम यज्ञ
दैवी सम्पद की बृद्धि के उपरांत व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने इन्द्रिय पर विजय प्राप्त करे। इन्द्रियों पर नियंत्रण ही सयम कहलाता है। इन्द्रियों के वश में होकर व्यक्ति की चेष्टाएँ बाहर की तरफ भागती हैं । तब व्यक्ति को सयम रूपी अग्नि में इन्द्रियों की इन चेष्टाओं को भस्मसात करना होता है। ध्यान रहें , श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के उत्थान का मार्ग इसी जीवन में इसी संसार में बताया है सो इस संसार में रहकर जिन सावधानियों को बरतना है वही सयम यज्ञ में सिखलाई गई हैं।
इन्द्रियों के प्रभाव और इनपर प्रभावी नियंत्रण के उपाय को श्रीकृष्ण ने द्वितीय और तृतीय अध्याय में भी बताया है। तो आइए देखें श्रीकृष्ण ने इस सम्बंध में जो कुछ पूर्व में कहा है उसका क्या तातपर्य है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
॥28॥
हमने देखा है कि श्रीकृष्ण परिणाम से असंग(detached) होकर कर्म करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि कर्म के परिणाम से खुद को विच्छेदित कर कर्म किया कैसे जाए। जब हम परिणाम से जुड़कर कर्म करते हैं तो ये प्रतीत होता है कि हम कर्म कर रहें हैं यानी कर्ता हम ही हैं। क्या ये सोच सही है? इसे समझने के लिए हमें अपनी आँखें थोड़ी और खोलनी होगी, अपने बौद्धिकता पर थोड़ा और बल देना होगा। हमें पुरुष और प्रकृति की अवधारणा को समझना होगा। प्रकृति मैटर को कहते हैं जबकि पुरुष उस प्रकृति का कॉन्सियसनेस है। यँहा पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष से नहीं है, बल्कि पुरुष यानी कॉन्सियसनेस से है। प्रकृति में तीन गुण विद्यमान रहते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। ये गुण प्रकृति में हमेशा ही विद्यमान होते हैं और यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। इनकी परस्पर मात्रा के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बनता है लेकिन यह व्यक्तित्व हमारे ईगो की दर्शाता है न कि हमारे स्व को।
तमोगुण यानी inertia यानी जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में बने रहने का गुण है। रजोगुण activity को व्यक्त करता है । मैटर अपने तमोगुण के कारण अपनी स्थिति में बना रहता है लेकिन रजोगुण उसे गति देता है। मैटर भले ही एक ही अवस्था में पड़ा रहे अपने तमोगुण के कारण, उसका रजोगुण उसे अंदर से चलायमान रखता है, परिवर्तनशील रखता है। अब आता है सत्वगुण यानी intellect जो मैटर को बुद्धि यानी intelligence यानी एक क्रमबद्धता प्रदान करता है। इन तीन गुणों की परस्पर जितनी मात्रा हमारे अंदर होती है हमारी प्रकृति भी उसी के अनुसार होती है।
इस प्रकृति में 24 तत्व होते हैं।
प्रथम पाँच तत्व हैं-
आकाश,
वायु,
अग्नि,
जल और
पृथ्वी।
इन पाँच तत्वों की अपनी विशेषताएँ हैं, यथा
आकाश-ध्वनि sound
वायु- स्पर्श touch
अग्नि-दृश्य/आकार/रंग sight
जल-स्वाद taste
पृथ्वी-गन्ध smell
ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। ये पाँच हमारी पाँच ऑर्गन्स ऑफ परसेप्शन को व्यक्त करते हैं
1.सुनने की क्षमता
2.स्पर्श की क्षमता
3.देखने की क्षमता
4.स्वाद की क्षमता
5.गन्ध (सूंघने) की क्षमता
ये पाँच हमारी पाँच कर्मेन्द्रियों के कारक हैं, जो इस प्रकार हैं
1. जिह्वा speech
2.हाथ,
3.पैर ,
4.जननेन्द्रियां,
5.उत्सर्जन के अंग,
ये पाँच व्हिकरण हैं। जिनके अतिरिक्त चार अंतःकरण के भी तत्व हैं जो निम्न हैं
1.मन mind
2.बुद्धि intellect
3.चित्त memory
4.अहंकार ego
ये कुल 24 तत्व प्रकृति के द्वारा जन्म लेते हैं और इन 24 तत्वों को के प्रति जागरूक है वह है कॉन्सियसनेस।
उपरोक्त 24 तत्वों को प्रकृति के तीनों गुण प्रभावित करते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयम के साथ ही बरतती रहती है और इस प्रकार कार्य और करण एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।सभी कर्म इन 24 तत्वों के समव्यव्हार के परिणाम होते हैं। इस प्रकार ये गुण और ये तत्व हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं। इससे "मैं" का जन्म होता है और ये आभास होता है कि मैं ही कर्ता हूँ। इससे अहंकार का जन्म होता है। इस अहंकार से ओतप्रोत ईगो को लगता है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सब कुछ करने और भोगने वाला हूँ। इस स्थिति में व्यक्ति आत्मा और ईगो में फर्क नहीं कर पाता है, उसे लगता है कि उसकी प्रकृति ही पुरुष है, उसका ईगो ही उसका सेल्फ है। एक उदाहरण लें। एक कंप्यूटर कई तरह के कार्य करता है लेकिन वह तभी कार्य करता है जब विद्दयुत की आपूर्ति होती है। तो क्या विद्युत कुछ करता है? नहीं । विद्युत कंप्यूटर को ऊर्जा प्रदान करता है जिसका उपयोग कर कंप्यूटर अपना कार्य कर पाता है। इसी प्रकार कर्म तो प्रकृति के द्वारा किया जाता है किंतु आत्मा के द्वारा उसकी प्रकृति को ऊर्जा प्रदान की जाती है, आत्मा कुछ नहीं कर रहा होता है, हम जो कुछ कर रहें होते हैं वह हमारी प्रकृति कर रही होती है। इस प्रकार प्रकृति को पुरुष से अलग कर देखने पर ज्ञात होता है कि हम जो कुछ कर रहें हैं वे सब हमारी प्रकृति के अनुसार कर रहें हैं, हमारा पुरुष यानी आत्मा तो मात्र करने की ऊर्जा भर है। वो हमारा न तो कर्म है न ही कर्म करने का परिणाम ही है। इससे स्पष्ट है कि हमारे कर्म हमारी प्रकृति की देन है। सो अगर हम अपना अहंकार त्याग भी दें तो भी हम कर्म करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है। इसी नियम में बंध कर सभी कर्म करते हैं। लेकिन अहंकार से ढँके मन और बुद्धि को लगता है कि ये कर्म हमारे सेल्फ के कर्मों के परिणाम हैं। जब इस अहंकार का नाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम जो कर रहें हैं , हमारे कर्म हमारे प्रकृति की देन हैं।
जो तत्वज्ञानी है उसे तत्वो और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है। तत्वज्ञानी को पता है कि सोचना, समझना, निर्णय लेना कर्म करना आदि सभी प्रकृति की देन हैं। ये सब प्रकृति के नियमों की देन हैं। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सब कुछ का कोई न कोई कारण है, भले व्यक्तिगत रूप से हम उस कारण को जानते हों या नहीं। इस आज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि प्रकृति के नियमों का कोई कारण नहीं है। ये तो हमारी अज्ञानता के कारण होता है। जब हम उस नियम और उसकी व्यख्या को समझ जाते हैं तो हमें लगता है कि हमने कोई रहस्य पा लिया है या खोज लिया है। जो व्यक्ति गुणों और कर्म के इस सम्बंध को समझता है वही तत्वज्ञानी है। इस अवस्था में वह व्यक्ति आत्मा और प्रकृति के अंतर को समझ पाता है। तब उसे समझ में आता है कि गुण गुण में ही बरतते हैं। ऐसा व्यक्ति कर्म और उसके परिणामो के बंधन में नहीं पड़ता, उसे ज्ञात होता है कि जो कुछ वह कर रहा है वे सब उसकी प्रकृति के कारण हैं, उसका सेल्फ उसके कर्मों से अलग है। इसका ज्ञान और अभ्यास आसक्ति से अलग करता है। यँहा भावना नहीं बुद्धि की प्रधानता होती है।
इसे यूँ समझें कि व्यक्ति के कर्म होते कैसे हैं। हमने अब तक देखा समझा है कि प्रकृति, उसके गुण और तत्व कर्मों के कारण हैं। तीनों में से जिस गुण की अधिकता हमारी प्रकृति में होती है हमारे कर्म भी उसी के अनुरूप होते हैं क्योंकि तब तत्वों का व्यवहार भी प्रमुखता के साथ उन उस गुण के अनुसार हो जाता है। हमारे मन के अंदर जो इक्षाएँ होती हैं वो हमारी प्रकृति के गुणों के अनुसार हीं होती हैं और उन इक्षाओं की अभिव्यक्ति कर्म के रूप में हमारे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होते हैं। जब हम स्वप्न में होते हैं तो उस स्वप्न के साथ हमारा एक तादाम्य होता है और उसी के अनुसार हमें सुख और दुख का स्वप्न में बोध होता है, लेकिन उस स्वप्न की और उससे जनित सुख और दुख की अनुभूति मात्र हमारी होती है। जैसे ही स्वप्न से ये तादाम्य टूटता है इस सुख और दुख से मुक्ति भी मिल जाती है। उसी प्रकार जब हम अपनी इक्षाओं से विच्छेदित हो जाते हैं तो उन इक्षाओं के अनुरूप मिल सकने वाले सुख और दुख भी समाप्त हो जाते हैं। तब हमसे जो कर्म होते हैं उनसे सुख या दुख नहीं मिलते। आसक्ति से तादाम्य का अभाव ही कर्म को कर्तव्य में परिवर्तित कर देता है । यही विवेक है। तत्वज्ञानी को ये विवेक सदा ही होता है। उसे कोई आसक्ति नहीं होती है, सो उसे पता होता है कि राग-द्वेष, सफलता-असफलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति ये सब मन के भाव हैं जिनसे कोई आसक्ति नहीं रखना है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता ही नहीं।
अर्जुन महाबाहो है, अर्थात महावीर है । श्रीकृष्ण उसे ये सम्बोधन दे कर याद दिलाते हैं कि सच्ची वीरता युद्ध की ही वीरता नहीं होती है बल्कि आसक्ति पर विजय ही सच्ची वीरता है जिसे अर्जुन को वरण करना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7
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यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
॥7॥॥
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।
इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
॥41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
॥42॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
॥43॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
॥3॥
अभी तक कि विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि कर्म से पथ भ्रष्ट करने वाला मूल कारण है व्यक्तो का इन्द्रियों के विषयों से विशेष अनुराग का होना। अतएव श्रीकृष्ण तार्किक ढंग से समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह से व्यक्ति अपने पापकर्म से मुक्त हो सकता है। इसके निम्न चरण होते हैं
1.सर्वप्रथम हमें ये समझना है कि व्यक्ति की कामनाएँ उसके इन्द्रियों से व्यक्त होती हैं। वाह्य जगत से हमारा सम्पर्क हमारी इन्द्रियाँ ही कराती हैं। इन इन्द्रियों के कारण ही कामनाएँ अपनी अभिव्यक्ति कर्मरूप में अभिव्यक्ति पाती हैं। हम अपने राग द्वेष यानी like-dislike के प्रभाव मरीन होते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं। हम नहीं समझ पाते हैं कि क्या सही क्या गलत है बल्कि हम तो अपने राग और द्वेष के वशीभूत होकर कर्म किये जाते हैं।
2.इन्द्रियाँ मन से नियंत्रित होती हैं। जब किसी विषय में डूब जाते हैं, जब हम इन्द्रियों के विषय को पूर्णतः राग-द्वेष से ही निर्धारित करते रहते हैं तो इन विषयों के प्रति हमारा राग और द्वेष(like & dislike) उस विषय के प्रति प्रेम और घृणा (love & hate) में बदल जाते हैं और हम उन विषयों से अपने लगाव या विलगाव के प्रति घोर आसक्ति से भर जाते हैं।
3.तब हमारे कर्मों को तार्किक शक्ति प्रदान करने के लिए हम बुद्धि के स्तर पर अपने विषयों के प्रति अनुराग या विराग को तर्क का जामा पहनाते हैं, चाहते हैं कि हम अपनी बुद्धि से अपने अनुराग या विराग को सही ठहरा सकें।
अतएव यदि हम कर्म के पथ से भ्रष्ट होना बचना चाहते हैं तो
1.सर्वप्रथम इन्द्रियों के विषयों से अनुरक्ति और विरक्ति दोनों से बचना होगा, कर्म लाइक और डिसलाइक से नहीं सही और गलत के दृष्टिकोण से करना चाहिए।
2.राग और विराग से अप्रभावित न होकर मन के स्तर पर इनके प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहिए ताकि मन में किसी के प्रति प्रेम या घृणा के भाव न होकर, समदर्शी हों।
3. इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बुद्धि के स्तर पर कुतर्क गढ़ने से बचें।
इन तीन चरणों को क्रमिक रूप से अपनाने से व्यक्ति विषय, मन और बुद्धि के राग द्वेष से मुक्त होकर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को प्राप्त हो पाता है, उसके कर्म कर्मयोग के रास्ते हो पाते हैं।
इस शिक्षा को द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त कर चुके हैं। बेहतर समझ के लिए उस अंश को हम यँहा पुनः दुहराना चाहेंगे।
श्लोक 60 की व्याख्या
इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।
लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।
हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।
श्लोक 61 की व्याख्या
उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।
हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।
अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी । इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
श्लोक 67 की व्याख्या
आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।
श्लोक 68 की व्याख्या
इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
कर्मयोग के माध्यम से व्यक्ति के उत्थान हेतु यज्ञ कर्म के क्रमबद्धता को बनाये रखना अति आवश्यक होता है। प्रथम चरण में व्यक्ति को अपने अंदर दैवी सम्पद की बृद्धि करनी होती है तो आइए देखें द्वितीय चरण का यज्ञ कौन सा है।
2.संयम यज्ञ
दैवी सम्पद की बृद्धि के उपरांत व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने इन्द्रिय पर विजय प्राप्त करे। इन्द्रियों पर नियंत्रण ही सयम कहलाता है। इन्द्रियों के वश में होकर व्यक्ति की चेष्टाएँ बाहर की तरफ भागती हैं । तब व्यक्ति को सयम रूपी अग्नि में इन्द्रियों की इन चेष्टाओं को भस्मसात करना होता है। ध्यान रहें , श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के उत्थान का मार्ग इसी जीवन में इसी संसार में बताया है सो इस संसार में रहकर जिन सावधानियों को बरतना है वही सयम यज्ञ में सिखलाई गई हैं।
इन्द्रियों के प्रभाव और इनपर प्रभावी नियंत्रण के उपाय को श्रीकृष्ण ने द्वितीय और तृतीय अध्याय में भी बताया है। तो आइए देखें श्रीकृष्ण ने इस सम्बंध में जो कुछ पूर्व में कहा है उसका क्या तातपर्य है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात् निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
॥28॥
हमने देखा है कि श्रीकृष्ण परिणाम से असंग(detached) होकर कर्म करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि कर्म के परिणाम से खुद को विच्छेदित कर कर्म किया कैसे जाए। जब हम परिणाम से जुड़कर कर्म करते हैं तो ये प्रतीत होता है कि हम कर्म कर रहें हैं यानी कर्ता हम ही हैं। क्या ये सोच सही है? इसे समझने के लिए हमें अपनी आँखें थोड़ी और खोलनी होगी, अपने बौद्धिकता पर थोड़ा और बल देना होगा। हमें पुरुष और प्रकृति की अवधारणा को समझना होगा। प्रकृति मैटर को कहते हैं जबकि पुरुष उस प्रकृति का कॉन्सियसनेस है। यँहा पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष से नहीं है, बल्कि पुरुष यानी कॉन्सियसनेस से है। प्रकृति में तीन गुण विद्यमान रहते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। ये गुण प्रकृति में हमेशा ही विद्यमान होते हैं और यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। इनकी परस्पर मात्रा के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बनता है लेकिन यह व्यक्तित्व हमारे ईगो की दर्शाता है न कि हमारे स्व को।
तमोगुण यानी inertia यानी जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में बने रहने का गुण है। रजोगुण activity को व्यक्त करता है । मैटर अपने तमोगुण के कारण अपनी स्थिति में बना रहता है लेकिन रजोगुण उसे गति देता है। मैटर भले ही एक ही अवस्था में पड़ा रहे अपने तमोगुण के कारण, उसका रजोगुण उसे अंदर से चलायमान रखता है, परिवर्तनशील रखता है। अब आता है सत्वगुण यानी intellect जो मैटर को बुद्धि यानी intelligence यानी एक क्रमबद्धता प्रदान करता है। इन तीन गुणों की परस्पर जितनी मात्रा हमारे अंदर होती है हमारी प्रकृति भी उसी के अनुसार होती है।
इस प्रकृति में 24 तत्व होते हैं।
प्रथम पाँच तत्व हैं-
आकाश,
वायु,
अग्नि,
जल और
पृथ्वी।
इन पाँच तत्वों की अपनी विशेषताएँ हैं, यथा
आकाश-ध्वनि sound
वायु- स्पर्श touch
अग्नि-दृश्य/आकार/रंग sight
जल-स्वाद taste
पृथ्वी-गन्ध smell
ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। ये पाँच हमारी पाँच ऑर्गन्स ऑफ परसेप्शन को व्यक्त करते हैं
1.सुनने की क्षमता
2.स्पर्श की क्षमता
3.देखने की क्षमता
4.स्वाद की क्षमता
5.गन्ध (सूंघने) की क्षमता
ये पाँच हमारी पाँच कर्मेन्द्रियों के कारक हैं, जो इस प्रकार हैं
1. जिह्वा speech
2.हाथ,
3.पैर ,
4.जननेन्द्रियां,
5.उत्सर्जन के अंग,
ये पाँच व्हिकरण हैं। जिनके अतिरिक्त चार अंतःकरण के भी तत्व हैं जो निम्न हैं
1.मन mind
2.बुद्धि intellect
3.चित्त memory
4.अहंकार ego
ये कुल 24 तत्व प्रकृति के द्वारा जन्म लेते हैं और इन 24 तत्वों को के प्रति जागरूक है वह है कॉन्सियसनेस।
उपरोक्त 24 तत्वों को प्रकृति के तीनों गुण प्रभावित करते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयम के साथ ही बरतती रहती है और इस प्रकार कार्य और करण एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।सभी कर्म इन 24 तत्वों के समव्यव्हार के परिणाम होते हैं। इस प्रकार ये गुण और ये तत्व हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं। इससे "मैं" का जन्म होता है और ये आभास होता है कि मैं ही कर्ता हूँ। इससे अहंकार का जन्म होता है। इस अहंकार से ओतप्रोत ईगो को लगता है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सब कुछ करने और भोगने वाला हूँ। इस स्थिति में व्यक्ति आत्मा और ईगो में फर्क नहीं कर पाता है, उसे लगता है कि उसकी प्रकृति ही पुरुष है, उसका ईगो ही उसका सेल्फ है। एक उदाहरण लें। एक कंप्यूटर कई तरह के कार्य करता है लेकिन वह तभी कार्य करता है जब विद्दयुत की आपूर्ति होती है। तो क्या विद्युत कुछ करता है? नहीं । विद्युत कंप्यूटर को ऊर्जा प्रदान करता है जिसका उपयोग कर कंप्यूटर अपना कार्य कर पाता है। इसी प्रकार कर्म तो प्रकृति के द्वारा किया जाता है किंतु आत्मा के द्वारा उसकी प्रकृति को ऊर्जा प्रदान की जाती है, आत्मा कुछ नहीं कर रहा होता है, हम जो कुछ कर रहें होते हैं वह हमारी प्रकृति कर रही होती है। इस प्रकार प्रकृति को पुरुष से अलग कर देखने पर ज्ञात होता है कि हम जो कुछ कर रहें हैं वे सब हमारी प्रकृति के अनुसार कर रहें हैं, हमारा पुरुष यानी आत्मा तो मात्र करने की ऊर्जा भर है। वो हमारा न तो कर्म है न ही कर्म करने का परिणाम ही है। इससे स्पष्ट है कि हमारे कर्म हमारी प्रकृति की देन है। सो अगर हम अपना अहंकार त्याग भी दें तो भी हम कर्म करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है। इसी नियम में बंध कर सभी कर्म करते हैं। लेकिन अहंकार से ढँके मन और बुद्धि को लगता है कि ये कर्म हमारे सेल्फ के कर्मों के परिणाम हैं। जब इस अहंकार का नाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम जो कर रहें हैं , हमारे कर्म हमारे प्रकृति की देन हैं।
जो तत्वज्ञानी है उसे तत्वो और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है। तत्वज्ञानी को पता है कि सोचना, समझना, निर्णय लेना कर्म करना आदि सभी प्रकृति की देन हैं। ये सब प्रकृति के नियमों की देन हैं। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सब कुछ का कोई न कोई कारण है, भले व्यक्तिगत रूप से हम उस कारण को जानते हों या नहीं। इस आज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि प्रकृति के नियमों का कोई कारण नहीं है। ये तो हमारी अज्ञानता के कारण होता है। जब हम उस नियम और उसकी व्यख्या को समझ जाते हैं तो हमें लगता है कि हमने कोई रहस्य पा लिया है या खोज लिया है। जो व्यक्ति गुणों और कर्म के इस सम्बंध को समझता है वही तत्वज्ञानी है। इस अवस्था में वह व्यक्ति आत्मा और प्रकृति के अंतर को समझ पाता है। तब उसे समझ में आता है कि गुण गुण में ही बरतते हैं। ऐसा व्यक्ति कर्म और उसके परिणामो के बंधन में नहीं पड़ता, उसे ज्ञात होता है कि जो कुछ वह कर रहा है वे सब उसकी प्रकृति के कारण हैं, उसका सेल्फ उसके कर्मों से अलग है। इसका ज्ञान और अभ्यास आसक्ति से अलग करता है। यँहा भावना नहीं बुद्धि की प्रधानता होती है।
इसे यूँ समझें कि व्यक्ति के कर्म होते कैसे हैं। हमने अब तक देखा समझा है कि प्रकृति, उसके गुण और तत्व कर्मों के कारण हैं। तीनों में से जिस गुण की अधिकता हमारी प्रकृति में होती है हमारे कर्म भी उसी के अनुरूप होते हैं क्योंकि तब तत्वों का व्यवहार भी प्रमुखता के साथ उन उस गुण के अनुसार हो जाता है। हमारे मन के अंदर जो इक्षाएँ होती हैं वो हमारी प्रकृति के गुणों के अनुसार हीं होती हैं और उन इक्षाओं की अभिव्यक्ति कर्म के रूप में हमारे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होते हैं। जब हम स्वप्न में होते हैं तो उस स्वप्न के साथ हमारा एक तादाम्य होता है और उसी के अनुसार हमें सुख और दुख का स्वप्न में बोध होता है, लेकिन उस स्वप्न की और उससे जनित सुख और दुख की अनुभूति मात्र हमारी होती है। जैसे ही स्वप्न से ये तादाम्य टूटता है इस सुख और दुख से मुक्ति भी मिल जाती है। उसी प्रकार जब हम अपनी इक्षाओं से विच्छेदित हो जाते हैं तो उन इक्षाओं के अनुरूप मिल सकने वाले सुख और दुख भी समाप्त हो जाते हैं। तब हमसे जो कर्म होते हैं उनसे सुख या दुख नहीं मिलते। आसक्ति से तादाम्य का अभाव ही कर्म को कर्तव्य में परिवर्तित कर देता है । यही विवेक है। तत्वज्ञानी को ये विवेक सदा ही होता है। उसे कोई आसक्ति नहीं होती है, सो उसे पता होता है कि राग-द्वेष, सफलता-असफलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति ये सब मन के भाव हैं जिनसे कोई आसक्ति नहीं रखना है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता ही नहीं।
अर्जुन महाबाहो है, अर्थात महावीर है । श्रीकृष्ण उसे ये सम्बोधन दे कर याद दिलाते हैं कि सच्ची वीरता युद्ध की ही वीरता नहीं होती है बल्कि आसक्ति पर विजय ही सच्ची वीरता है जिसे अर्जुन को वरण करना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7
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यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
॥7॥॥
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।
इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
॥41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
॥42॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
॥43॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
॥3॥
अभी तक कि विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि कर्म से पथ भ्रष्ट करने वाला मूल कारण है व्यक्तो का इन्द्रियों के विषयों से विशेष अनुराग का होना। अतएव श्रीकृष्ण तार्किक ढंग से समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह से व्यक्ति अपने पापकर्म से मुक्त हो सकता है। इसके निम्न चरण होते हैं
1.सर्वप्रथम हमें ये समझना है कि व्यक्ति की कामनाएँ उसके इन्द्रियों से व्यक्त होती हैं। वाह्य जगत से हमारा सम्पर्क हमारी इन्द्रियाँ ही कराती हैं। इन इन्द्रियों के कारण ही कामनाएँ अपनी अभिव्यक्ति कर्मरूप में अभिव्यक्ति पाती हैं। हम अपने राग द्वेष यानी like-dislike के प्रभाव मरीन होते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं। हम नहीं समझ पाते हैं कि क्या सही क्या गलत है बल्कि हम तो अपने राग और द्वेष के वशीभूत होकर कर्म किये जाते हैं।
2.इन्द्रियाँ मन से नियंत्रित होती हैं। जब किसी विषय में डूब जाते हैं, जब हम इन्द्रियों के विषय को पूर्णतः राग-द्वेष से ही निर्धारित करते रहते हैं तो इन विषयों के प्रति हमारा राग और द्वेष(like & dislike) उस विषय के प्रति प्रेम और घृणा (love & hate) में बदल जाते हैं और हम उन विषयों से अपने लगाव या विलगाव के प्रति घोर आसक्ति से भर जाते हैं।
3.तब हमारे कर्मों को तार्किक शक्ति प्रदान करने के लिए हम बुद्धि के स्तर पर अपने विषयों के प्रति अनुराग या विराग को तर्क का जामा पहनाते हैं, चाहते हैं कि हम अपनी बुद्धि से अपने अनुराग या विराग को सही ठहरा सकें।
अतएव यदि हम कर्म के पथ से भ्रष्ट होना बचना चाहते हैं तो
1.सर्वप्रथम इन्द्रियों के विषयों से अनुरक्ति और विरक्ति दोनों से बचना होगा, कर्म लाइक और डिसलाइक से नहीं सही और गलत के दृष्टिकोण से करना चाहिए।
2.राग और विराग से अप्रभावित न होकर मन के स्तर पर इनके प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहिए ताकि मन में किसी के प्रति प्रेम या घृणा के भाव न होकर, समदर्शी हों।
3. इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बुद्धि के स्तर पर कुतर्क गढ़ने से बचें।
इन तीन चरणों को क्रमिक रूप से अपनाने से व्यक्ति विषय, मन और बुद्धि के राग द्वेष से मुक्त होकर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को प्राप्त हो पाता है, उसके कर्म कर्मयोग के रास्ते हो पाते हैं।
इस शिक्षा को द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त कर चुके हैं। बेहतर समझ के लिए उस अंश को हम यँहा पुनः दुहराना चाहेंगे।
श्लोक 60 की व्याख्या
इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।
लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।
हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।
श्लोक 61 की व्याख्या
उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।
हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।
अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी । इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
श्लोक 67 की व्याख्या
आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।
श्लोक 68 की व्याख्या
इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
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