श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 15
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥
पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर
॥15॥
अब तक दी गई शिक्षा का मूल बल कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण करना है। जिस समय श्रीकृष्ण अर्जुन से ये वार्तालाप कर रहें हैं , श्रीकृष्ण के अनुसार ही उसके भीत पहले से वे लोग जिनको मोक्ष की इक्षा रही है वे भी इसी मार्ग का अनुसरण कर कर्म करते रहे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ही अर्जुन को समझाते हैं कि ये कोई नूतन ज्ञान नहीं है बल्कि बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है लेकिन साथ ही ये भी जोड़ देते हैं कि इसका पालन वही करते हैं जिनको मोक्ष की इक्षा हो। अन्य नहीं। इसी मार्ग से व्यक्ति को अपने सेल्फ की पहचान होती है और उसे ज्ञात होता है कि वह भी वही है जो अन्य हैं, जो परमेश्वर है। हम सभी एक दूसरे का विस्तार हैं और हमारे सेल्फ का सर्वव्यपी विस्तार ही परमेश्वर है जिसके हम अंश हैं।
इस अध्याय के प्रारम्भ में ही ये बात आई है कि कर्मयोग के मार्ग का ज्ञान तो ईश्वर ने सृष्टि के शुरुआत में ही दिया था जिसे वे यँहा पुनः दुहरा रहें हैं ताकि मानव मात्र की स्मृति में ये ज्ञान पुनः आ सके।
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