श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 8
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ
॥8॥
अवतार की समझ हो जाने से अवतार का उद्देश्य भी समझ में आ जाता है। ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति ही अवतार है और ये तभी सम्भव होता है जब व्यक्ति के मन में आसुरी प्रवृत्तियों का नाश होता है, उसका लोभ, काम, ईष्या, क्रोध, असत्य, हिंसा आदि का नाश होता है। इनकी वृद्धि ही अधर्म है, जो कुछ प्रकृति के स्वाभाविक नियम से विपरीत है वह अधर्म है, तमोगुण , जिसकी विस्तृत चर्चा हमने की है पहले वही अधर्म है, और इनके बदले प्रेम, सत्य , अहिंसा आदि गुणों की वृद्धि और प्रकृति के गुणों के संतुलन से इन आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश होता है। यही हमारे मन में ईश्वर के अवतार का परिणाम है जिसके कारण धर्म की पुनः स्थापना होती है। धर्म की स्थापना का तात्पर्य योग अनुरूप आचरण का समाज में प्रवाह ही है।
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