श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
॥6॥
अर्जुन के शंका समाधान के क्रम में श्रीकृष्ण ने उसे योग का महत्व तो समझाया ही है और ये भी बताया है कि यह योग सृष्टि के प्रारम्भ से ही है । अर्थात ये वो ज्ञान है जिसके कारण सृष्टि का सम्यक संचालन सम्भव है। जब श्रीकृष्ण की दी जा रही शिक्षा में ये भी शामिल है कि सिद्ध पुरुष यानी REALIZED MASTER कौन है जिसे न केवल योग पुर्ण ज्ञान है बल्कि उसका नियमित पालन भी करता है। इसी को विस्तारित करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा, परमात्मा, कर्म, और अंततः ईश्वर से भी परिचित कराते हैं।
अपने व्यवहारिक सांसारिक जीवन में हम प्रायः ईश्वर का स्मरण करते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को या तो सिरे से नकार देते हैं या फिर इसे एक ऐसी कल्पना का सृजन मानते हैं जो मनुष्य के भय से उत्पन्न होता है। कुछ लोग ईश्वर को सत्ता हासिल करने के लिए गढ़ी गई कल्पना मानते हैं। कोई ईश्वर के निराकार स्वरूप की चर्चा करता है तो कोई साकार। श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जिन मौलिक तथ्यों और रहस्यों को बार बार उद्घाटित किया है उनमें ईश्वर भी है।
ईश्वर सब का नियंता है, और प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों , तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण से मुक्त अपनी माया से प्रत्यक्ष होने वाला होता है। इस एक वक्तव्य में श्रीकृष्ण ने ईश्वर को समझने और जानने का मार्ग दे दिया है। द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के सम्बंध में अर्जुन को विस्तार से समझाते हुए बताया है कि आत्मा परमात्मा का अंश है जो प्रत्येक व्यक्ति का सेल्फ यानी उसका स्व है। इस कारण से आत्मा अजर, और अमर यानी न जीर्ण होने वाला है, न जन्म लेने वाला है और न मरने वाला अर्थात अपरिवर्तनीय है। पुनः यँहा भी वे कहते हैं कि ईश्वर अजन्मा है और अविनाशी है अर्थात वह जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्त है और नाश रहित है। इसके बावजूद उसका स्वरूप विद्यमान है।
अब हम देखें कि अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण कैसे सिलसिलेवार अपना यानी ईश्वर का परिचय देते हैं।
1.वे अजन्मा हैं अर्थात जन्म मरण के चक्र से मुक्त हैं।
2.वे अविनाशी हैं अर्थात उनका कभी नाश नहीं होता है।
3.वे काल से परे हैं क्योंकि जन्म मरण , नाश-विनाश से मुक्त हैं।
4.वे सम्पूर्ण सृष्टि के नियंता हैं।
5.वे अपनी प्रकृति और उसके तीनों गुणों को अपने ही अधीन रखकर अपनी माया से स्वरूप में प्रत्यक्ष होते हैं।
हम देखते हैं कि हमारी पहचान हमारे ""मैं"" से होती है। इस "मैं" की अभिव्यक्ति इस मैं के शरीर से होती है। इस शरीर में विभिन्न अंग होते हैं , असंख्य कोशिकाएँ होती हैं। अलग अलग अंग अलग अलग कार्यों के लिए बने होते हैं और वे अपना अपना कार्य करते रहते हैं। परंतु उन सब का अपना अपना अलग अलग कार्य होते हुए भी वे सभी अंग एक दूसरे से मुक्त नहीं होते हैं बल्कि एक तारतम्य में एक "मैं" की सम्पूर्णता के लिए कार्य करते हैं। इन प्रत्येक अंग के कार्य का अपना महत्व तो होता है किंतु यदि उनको उनके "मैं" से हटाकर देखा जाए तो तो वे निर्थक प्रतीत होते हैं। हमारी असंख्य कोशिकाएँ भी नित्य अपने अपने कार्य में लगी रहती हैं। हमारे जीवित शरीर में ही उनका निरन्तर नाश और निरन्तर उतपत्ति भी होते रहता है। परंतु उन कोशिकाओं का कार्य भी सम्पूर्णता में हमारे "मैं"के लिए ही होता है, उनमें आपस में एक तंत्र बना रहता है, वे अपने आप में स्वतंत्र इकाई होकर भी अपने अस्तित्व के लिए एक वृहत्त इकाई का भाग होती हैं। इसी का विस्तार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में होता है, जिसमें पंचतत्व से बने विभिन्न पिंड होते हैं जिनका स्वतंत्र अस्तिव होते हुए भी सम्पूर्णता में वे सभी एक ब्रह्मांड के भाग मात्र होते हैं। जिस प्रकर "मैं" के शरीर को "मैं नियंत्रित करता है उसी प्रकार इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के प्रत्येक अवयव को एक ईश्वर नियंत्रित करता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति का प्रत्येक अंग, प्रत्येक कोशिका स्वतंत्र अस्तित्व रखते हुए भी उसके मैं के प्रति ही उत्तरदायी है उसी प्रकार इस ब्रह्मांड का प्रत्येक अवयव भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखते हुए उस एक ब्रह्मांड के प्रति ही उत्तरदायी है। जिस प्रकार मैं की सम्पूर्णता उसके प्रत्येक अंग और प्रत्येक कोशिका से अलग अलग व्यक्त होती है उसी उस एक ईश्वर की अभिव्यक्ति ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अवयव में होते रहता है। प्रत्येक अवयव स्वतंत्र होकर भी उसी एक ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र होता है। इस प्रकार हम देखते है कि जिस प्रकार एक ही कॉन्सियसनेस का विस्तार न्यूनतम अवयव से लेकर बृहत्तम अवयव तक होता है जो सबको नियंत्रित करता है। इसी सम्पूर्णता का कॉन्सियसनेस जो हर न्यून से न्यून से लेकर वृहत्तम तक व्यक्त होता है, उसे नियंत्रित करता है वही ईश्वर है। इस प्रकार ये सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ईश्वर की अभिव्यक्ति है जो प्रकृति के नियमों से संचालित होते रहता है जो एक खास पैटर्न लिए होते हैं और जो इस कॉन्सियसनेस का विवेक होते हैं। ये उसी प्रकार से है जैसे प्रत्येक लहर एक लहर विशेष है लेकिन प्रत्येक लहर मात्र जल के पिण्ड का भाग मात्र है , उसकी अभिव्यक्ति भर है। इस प्रकार जल आत्मा है, लहर जीव है और जल का पिंड ईश्वर है। ये समझने के लिए एक रूपक मात्र है। इस प्रकार ईश्वर की अभिव्यक्ति प्रत्येक अभिव्यक्त स्वरूप में है, कोई भी इससे अलग नही है। इसी को द्वितीय अध्याय मे आत्मा और परमात्मा के परस्पर सम्बन्ध को समझते हुए श्री कृष्ण कह चुके हैं। इस प्रकार प्रत्येक इकाई एक अंतिम वृहत्तम के प्रति उत्तरदायी भी है और उसी की अभिव्यक्ति मात्र है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक का अस्तित्व तभी है जब सम्पूर्णता का अस्तित्व है। यदि आप हैं , आपका अस्त्तिव सत्य है तो दूसरे का भी अस्तित्व, तीसरे का भी अस्तित्व और इस प्रकार ईश्वर का भी अस्तित्व सत्य है। और ये सभी प्रकृति के नियम की बौद्धिकता से बंधे हुए हैं। अगर हम सत्य हैं तो आप सत्य हैं, यदि मैं हूँ तो आप भी हैं, अन्य भी हैं। जिस प्रकार "मैं" का अस्तित्व सत्य है ईश्वर का अस्त्तित्व भी सत्य है। "मैं" कल्पना नही तो अन्य कैसे कल्पना है , ईश्वर कैसे कल्पना है? आप ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं, ईश्वर आपकी सम्पूर्णता है।
ईश्वर सब का नियंता है। ऐसा कैसे हो सकता है? ईश्वर ही सब में है, सभी का सेल्फ है, सभी का कॉन्सियसनेस है, वही प्रकृति का नियम भी है सो वह सभी का नियंता भी है। सब का मालिक एक है। वह सभी का नियंता तो है , लेकिन वह किसी से नियंत्रित नहीं होता है। सो वह प्रकृति से नियंत्रित नहीं होता है, बल्कि प्रकृति उसके अधीन होती है, वह कर्तापन से मुक्त होता है। इस कारण उसका स्वरूप कुछ भी हो सकता है, वह खुद को किसी भी स्वरूप में व्यक्त हो सकता है। चुँकि वह कर्मों से नहीं बंधा होता है सो उसका स्वरूप भी जन्म की निरंतरता से मुक्त है और मृत्यु से परे है। वह भूत, भविष्य और वर्तमान से यानी काल से परे होता है। ये तो मनुष्य की अपनी सुविधा है कि वह ईश्वर को किस स्वरूप में समझता है, इसके लिए वह भिन्न भिन्न रूपों में समझता है। जिसकी जैसी श्रद्धा है उसके लिए ईश्वर का वही स्वरूप सत्य है।
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