श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 5
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ
॥5॥
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनके और अर्जु के कई जन्म हुए हैं जिसके बारे मे भले ही अर्जुन को ज्ञान नहीं है लेकिन श्रीकृष्ण को इस बात की जानकारी है। इससे पुनर्जन्म के सिद्धांत की झलक मिलती है।
जिस प्रकार आत्मा और परमात्मा को भौतिक रूप से अनुभव करना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार पुनर्जन्म की भी भौतिक रूप से व्याख्या करना सम्भव नहीं है। किन्तु व्यवहार के स्तर पर हम आत्मा और परमात्मा को न केवल महसूस कर सकते हैं बल्कि उनकी स्थिति को प्राप्त भी किया जा सकता है। योग का ज्ञान सृष्टि के प्रारम्भ से है और लोक परम्परा से इसका संचार वर्तमान तक हुआ है। इस बात को समझने के लिए जिस व्यवहार की समझ होनी चाहिए वो आपको अपने भौतिक ज्ञान से नहीं हो सकता। भौतिक ज्ञान का अपना महत्व है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है। अर्जुन खुद बहुत बड़ा योद्धा था। उसका युद्ध कौशल उसका भौतिक ज्ञान है। श्रीकृष्ण कभी भी उसके इस भौतिक ज्ञान को नीचा नहीं दिखाते, बल्कि अर्जुन की संसार में पहचान उसके युद्ध कौशल के भौतिक ज्ञान के कारण ही है। तभी तो श्रीकृष्ण अर्जुन को परन्तप कह कर सम्बोधित करते हैं अर्थात जिसके ताप से विरोधी त्रस्त हो जाते हैं। किंतु ये भौतिक कौशल सफलता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं होते है। इसके लिए योगमार्ग का ज्ञान होना अनिवार्य होता है। कर्मयोग का ज्ञान ही वो मार्ग है जिसपर चलकर यदि हम अपने कौशल का उपयोग करते हैं तो वांछित सफलता प्राप्त करते हैं। यदि इस मार्ग पर चले बिना अपने कौशल का उपयोग करते हैं तो हमारा कौशल हमें कुछ नहीं दे पाता है। इस तथ्य का ज्ञान हर युग में सिद्ध व्यक्तियों को होता है और सिद्ध व्यक्ति को पता है कि ये मार्ग सदा से चलते आया है भले एक पीढ़ी विशेष के कुछ या बहुतेरे लोग इससे अनभिज्ञ हों। इसे आप इस तरह से समझिए कि हमारे अज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि ज्ञान के मार्ग का अस्तिव ही नही है।
Comments
Post a Comment