श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 4
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 4
अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥
अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
॥4॥
अध्याय 4 की शुरुआत में ही स्पष्ट हो चुका है कि योग सम्बंधित जिस शिक्षा को श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बतलाया है वह शिक्षा कोई नई बात नहीं बताती है बल्कि, यदि श्लोकों के शाब्दिक अर्थ में लें तो समझते हैं कि इस शिक्षा को सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान ने सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र मनु से, और मनु ने इक्ष्वाकु से, और इस प्रकार होते हुए ये शिक्षा राजर्षियों तक पहुँची थी। तत्पश्चात समय के अंतराल में ये शिक्षा विलुप्त हो गई और अब भगवान पुनः उसे ही अर्जुन को बताते हैं क्योंकि अर्जुन उनका अनन्य भक्त और मित्र दोनों है। ऐसी स्थिति में अर्जुन को शंका होनी स्वाभाविक है कि श्रीकृष्ण का जन्म तो अर्जुन के जन्म के आस पास ही था तो उन्होंने इस ज्ञान को सूर्य को कैसे दिया होगा जो सृष्टि के प्रारम्भ से ही है। सो अर्जुन इस आशय का प्रश्न श्रीकृष्ण के समक्ष उठता है तो वह प्रश्न अतिस्वाभाविक है।
अब जरा ध्यान दें कि आप अपने इस संशय को कैसे दूर करेंगे। वस्तुतः योग की शिक्षा सृष्टि के प्रारम्भ से ही है जो सृष्टि के संस्कार में प्रवाहित होती रही थी। मन और इक्षा से ये शिक्षा जुड़ी हुई थी, इसीलिए इसका पीढ़ी दर पीढ़ी संचार होते रहा। जो बात पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होती है वही तो परम्परा है और यदि समाज के पीढ़ियों में संचारित होती है तो लोक परम्परा है। चुँकि इस शिक्षा में ज्ञान भी है और ज्ञान प्राप्ति का मार्ग कर्म भी निहित है सो इस शिक्षा के वाहक राजर्षी बने जो सत्वगुण और रजोगुण दोनों को धारण करते थे। लेकिन समय अंतराल में किसी भी चीज चाहे वो ज्ञान ही क्यों न हो उसमें कई अन्य बातें भी जुड़ती जाती हैं सो मूल का स्वरूप बदल जाता है। लेकिन फिर कभी किसी व्यक्ति के समक्ष ऐसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं जिनके निदान के लिए उसे ज्ञान के मूल स्वरूप की तरफ लौटना ही पड़ता है। लेकिन इस शर्त के पूरा होने के लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है, एक कि उस व्यक्ति को मूल ज्ञान रखने वाले के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो यानी उसके प्रति अनन्य भक्ति हो और दूसरा ये कि याचक व्यक्ति ज्ञानी व्यक्ति से इस तरह जुड़ा हो कि अपने मन के सारे संशय और विषाद को निःसंकोच कह सके यानी उससे मित्रवत भी हो। अर्जुन और श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में ये दोनों ही शर्त पूरे होते हैं। अर्जुन के समक्ष धर्म और कर्म को लेकर विषम संशय उत्पन्न हो चुका था, सो उसे मूल ज्ञान की आवश्यकता थी और जब भी हम भटकते हैं , हमारा मूल ही हमें सही मार्ग पर ले आता है। जीवन के मौलिक सिद्धान्त आज भी वही हैं, प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा इत्यादि और योग के भी मौलिक सिद्धान्त यही हैं। हमारी समृद्धि चाहे जितनी बढ़े मनुष्य के रूप में जीवन के मौलिक तथ्य वही रहते हैं। सो ये ज्ञान परम्परा से , लोक परम्परा से भी बंधा हुआ है।
आगे की वार्ता में श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का समाधान करेंगे।
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