श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 21

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥

जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता है।
।।21।।
अब श्रीकृष्ण इस पण्डित व्यक्ति की तीसरी विशेषता बताते हैं। यह विशेषता उसके द्वारा अपने सेंसेज यानी इन्द्रियों पर नियंत्रण से उत्पन्न होती है।
3.इन्द्रियों पर नियंत्रण
पण्डित व्यक्ति को कोई आशा या अपेक्षा नहीं होती है किसी से भी, उसका मन और शरीर उसके सम्पूर्ण नियंत्रण में होता है, किसी भी चीज को धारण करने, उसके स्वामित्व का भाव उसमें नहीं होता है, और वह मात्र शरीर के निर्वाह के लिए ही कर्म करता दिखता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी तरह के पाप से मुक्त होता है।
         अब भला ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन ऐसा एकदम सम्भव होता है। जब हम अपने स्वधर्म के अनुसार, कर्मों के परिणाम को त्याग कर कर्म करने लगते हैं तो उस समय हमारी इन्द्रियाँ हमारे सम्पूर्ण वश में होती हैं। द्वितीय अध्याय में हमने देखा और समझा है कि इन्द्रियों को कैसे नियंत्रित किया जाता है। दरअसल हमारी सारी प्रतिक्रिया वाह्य संसार के प्रति ही होती है। और वाह्य संसार का बोध हमें अपनी इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। जब परिणाम के प्रति कोई मोह नहीं होता है और कर्मों को विवेक संचालित करते हैं तो कर्म मोह के बन्धन से नहीं बाँधे जाते हैं। जब मोह से, लगाव से मुक्ति होती है तो अपेक्षाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं और कर्मों में कोई मिलावट नहीं हो पाता। तब हम वही करते हैं जिनको करना सही है , न कि हम किसी अपेक्षा, आशा, स्पृहा, लगाव, लालच, भय, से कुछ करते हैं। ऐसी स्थिति में मन की उद्वेलना, उत्तेजना समाप्त हो जाती है। तो फिर पाप कर्मों के होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।
    तो क्या व्यक्ति को संसार से विरक्त होकर सिर्फ अपने शरीर निर्वाह के लिए जीना चाहिए? ये प्रश्न मन में उठना लाजमी है। लेकिन अब तक श्रीकृष्ण बार बार समझा चुके हैं कि राग से विरक्ति संसार के कल्याण से विरक्ति नहीं होती है। आपको,  हमको, सबको अपनी इन्द्रियों के बहकावे पर नियंत्रण रखना होता है, और नियत यज्ञ कर्म करने होते हैं ताकि हम निरन्तर सत्य की तरफ बढ़ते हुए संसार के हित में कर्मरत रहें। यदि इस बीच हमारे अंदर अपने कर्मों के परिणाम के प्रति मोह जगा तो फिर हम उनके इक्षित फलों को प्राप्त करने के लिए सही मार्ग छोड़कर पसन्द की तरफ घूम जाएंगे। नतीजा में हम लक्ष्य से विचलित होकर तमाम तरह के अय्याशी, शत्रुता, दाव-पेंच के मार्ग पर चलकर सिर्फ और सिर्फ पाप कर्म यानी अवांछित कर्म ही करेंगे।
    

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