श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥
जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता है।
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अब श्रीकृष्ण इस ज्ञानी यानी पंडित व्यक्ति की दूसरी विशेषता को बताते हैं।
2.परिणाम से मुक्ति और कर्तापन का अभाव।
पहले श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय में बता चुके हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जिसे उस अध्याय में स्थितप्रज्ञ कहा गया है और जिसे यँहा पंडित कहा जा रहा है वह कर्म तो करता है लेकिन कर्म के परिणाम से मुक्त होता है। अर्थात पण्डित वो है जो कर्म परिणाम की इक्षा से नहीं करता है बल्कि वह तो कर्म सिर्फ अपने स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण के भाव से करता है । परिणाम से नहीं बंधे रहने के कारण और स्वधर्म और समर्पण के भाव से कर्म करने के कारण उसे अपने कर्म में ही सारे सुख मिल जाते हैं, उसे सुख के लिए परिणाम जैसे बाहरी श्रोत पर निर्भर नहीं होना पड़ता है । चुँकि परिणाम भविष्य में होता है और कर्म वर्तमान में होता है सो वह सदा ही कर्म में चिर सुख को प्राप्त करता रहता है, उसे परिणाम से न तो सुख मिलता है न दुख, न हर्ष होता है न विषाद। परिणाम से मुक्त होने के कारण वह परिणाम से लगाव भी नहीं रखता सो परिणाम न तो उसे मोह से बाँध पाते हैं न ही उसे सुख-दुख, राग-द्वेष, ही दे पाते हैं। अतएव वह उद्वेलित नहीं होता है और न ही कर्मों के बन्धन में बँधता ही है। ऐसी स्थिति में वह जो कुछ करता है उसका वह मात्र द्रष्टा होता है, उसे कर्तापन का कोई बोध नहीं होता कि मैंने ये कर दिया तो ये हो गया। सो वह सब कर्म करता हुआ भी अकर्ता ही रहता है।
तो क्या ज्ञानी व्यक्ति को इस संसार के लिए, इस समाज के लिए कुछ नहीं करना होता है? ये एक अति स्वाभाविक सवाल है जो किसी के मन में उठ सकता है। जी नहीं। ऐसी बात नहीं है। परिणाम से मुक्ति का अर्थ ये नहीं कि तो कर्म से विरक्त होईये। दरअसल परिणाम से मुक्ति का अर्थ है कि कर्मों के परिणाम के मोह से आप नहीं बंधते बल्कि आप वो करते हैं जो आपको अपने स्वधर्म के अनुसार करना है। वह तो निश्चित ही करना है और सिर्फ करना ही नहीं है बल्कि पूर्ण समर्पण से करना है। और जो करना है वह आपके पसन्द के अनुसार नहीं है बल्कि वह सही होने के कारण है। यानी ऐसे कर्म आप करते हैं जो like से नहीं right होने के कारण किये जाने हैं और सही वही है जो आपके स्वधर्म के अनुसार है। यँहा निष्काम भाव से कौन से कर्म करना है तो आप एक बार तृतीय अध्याय के यज्ञ कर्मों का स्मरण करें।
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