श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 2 एवम 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 2 एवम 3
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
॥2॥
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
॥3॥
परम्परा से प्राप्त योग की शिक्षा का ज्ञान मन एवम इक्षा से होते हुए उन व्यक्तियों को होता है जो राजर्षि थे अर्थात जिनमें राजोगुण भी थे और जो ऋषि तुल्य थे यानी जिनमें सत्वगुण भी थे किंतु समय के प्रवाह के साथ धीरे धीरे ये ज्ञान विलुप्त भी हो गया। दरअसल समाज में जब रजोगुण और सत्वगुण का ह्रास होता है तो योग की शिक्षा का भी विलोपन होते जाता है। लेकिन जिसे परम् पिता परमेश्वर से लगाव होता है उसे इस योग का ज्ञान पुनः होता है। समाज से सत्वगुण और रजोगुण के ह्रास के बावजूद अगर किसी व्यक्ति को ये गुण प्राप्त होते हैं तो उसे कर्म करने की योगबुद्धि प्राप्त होती ही है। जब व्यक्ति पथभ्रष्ट होता है तो कोई सिद्ध पुरुष उसे सही मार्ग बताता है। जब भी समाज में उथल पुथल मचता है, समाज से भली प्रवृतियों का विलोप होता है और आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं तब कोई सिद्ध व्यक्ति समाज को रास्ता दिखाने , उसका मार्गदर्शन करने के लिए आगे आता है
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